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उन्हें विस्तार चाहिए था

विनय गुदारी Updated Tue, 05 Jun 2018 06:57 PM IST
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अभिमन्यु अनत

अनवरत लेखकीय प्रयास एवं प्रतिबद्धता के साथ उन्होंने अविस्मरणीय कृतियां दीं, जोकि सिर्फ मॉरीशस ही नहीं, बल्कि वृहत हिंदी समुदाय की धरोहर हैं। मॉरीशस के पुरोधा रचनाकार अभिमन्यु अनत को श्रद्धांजलि स्वरूप विनय गुदारी का यह लेख-


जो व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत भूमिका से उबरकर अपने समाज, मानवता तथा भावी पीढ़ी के लिए धरोहर छोड़ जाता है, वही प्राणों में सार्थकता भरने वाला होता है। मॉरीशस के पुरोधा रचनाकार अभिमन्यु अनत ने न केवल इस देश के काले इतिहास में दबे गिरमिटिया मजदूरों की व्यथाओं और संघर्षों को विश्व से परिचित कराया, अपितु  देशभक्त की भूमिका निभाते हुए हिंदी के माध्यम से भारत एवं मॉरीशस को जोड़ने का दायित्व भी निभाया। इसके चलते प्रवासी देशों ने भी अपनी स्थानीयता को इस मंच के जरिये हिंदी जगत तक पहुंचाया। 


नौ, अगस्त 1937 को मॉरीशस के त्रियोले गांव में एक गरीब परिवार में अभिमन्यु अनत का जन्म हुआ। आर्थिक विपन्नता के कारण औपचारिक शिक्षार्जन से वंचित होने के बावजूद उनके भीतर पनप रहे रचनाकार ने घुटने नहीं टेके। अनवरत लेखकीय प्रयास एवं प्रतिबद्धता के साथ उन्होंने अविस्मरणीय कृतियां दीं, जोकि सिर्फ मॉरीशस ही नहीं, बल्कि वृहत हिंदी समुदाय की धरोहर हैं। अपनी संवेदना के साथ वह निरंतर शोषण के खिलाफ संघर्ष करते गए। गिरमिटिया मजदूरों को आवाज देने वाले और उनके 'लाल पसीनों' को वर्तमान काल में गौरव रूप में प्रतिष्ठत करने वाले मॉरीशस के इस माटी के बेटे ने कालांतर में गद्य को ही अपना लेखन-गगन बनाया। उनको स्पेस चाहिए था, विस्तार चाहिए था।


यह इसलिए, क्योंकि वे देश और समाज के संकीर्ण नजरिये से समस्याओं को प्रस्तुत करने की सीमा से उबरकर संपूर्ण मानवीय संवेदना से संपर्क स्थापित करना चाहते थे। मॉरीशस के लेखक-कवि उनके भारतीय स्थापित रचनाकारों के संपर्क से ही छपने लगे। राष्ट्रीय स्तर पर कहानियों के माध्यम से स्थानीय समस्याओं को हिंदी में उजागर करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। कला के अद्भुत पुजारी अभिमन्यु जी ने नाटक के क्षेत्र में भी स्तरीय मापदंड स्थापित किए। उनके अनेक नाटक मंचित हुए, जिनमें रोक दो कान्हा और रविगान प्रमुख हैं।


उनके गांव में उन्हें गुरुजी से संबोधित करने वाले वैश्विक स्तर पर स्थापित लेखक की उनकी छवि को देखकर गौरवान्वित होते हैं। प्रकृति प्रेमी अनत प्रायः शांत स्वभाव के थे। भारत या अन्य देशों से जो भी साहित्य प्रेमी अथवा भाषाविद उनसे उनके संवादिता नामक निवास स्थान पर मिलने आते थे, इसी भाव के साथ अपनी स्मृतियों को संजोए लौटते कि इस व्यक्ति के आतिथ्य सत्कार एवं शील स्वभाव के तुल्य वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित रचनाकार कम ही मिलते हैं। 


अपने पिताजी के साथ खेतों में काम करने वाले अनत सभी से कहते थे कि उन्होंने लिखना तभी आरंभ किया, जब उन्होंने अपने पूर्वजों पर हुई क्रूर यातनाओं को मानसिक तौर पर झेलना आरंभ किया। उनके पात्र विविध सामाजिक स्तरों से निकलते हुए उस सामासिक शक्ति के प्रणेता बनते हैं, जहां जातीय भेदभाव न हों। 'शर्तबंद मजदूर' बनकर जब वे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के तहत करीब चालीस दिनों की समुद्री यात्रा द्वारा इस अनजान देश में कठिन परिस्थितियों में लाए जा रहे थे, तब उनकी एकमात्र शक्ति उनका भाईचारा ही थी। इसी एकता का नाम ‘जहाजिया भाई’ देकर अभिमन्यु अनत ने इसे गांधी जी बोले थे जैसे उपन्यास में संरक्षित किया। और यही शर्तबंद मजदूर कालांतर में इस देश की नींव बन जाते हैं। इसी चार जून को अपनी लेखनी को अपने दामन में संजोए हुए वैश्विक हिंदी जगत को अस्सी से अधिक कृति-सुमन अर्पित करते हुए अभिमन्यु अनत एक अद्भुत अनुभव की खोज में लंबी यात्रा पर निकल गए। 


-वरिष्ठ प्राध्यापक, महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस
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