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गंगा सफाई अभियान को जीवन से जोड़ना होगा

Thu, 13 Nov 2014 08:22 PM IST
शीतला सिंह
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गंगा की सफाई के लिए प्रधानमंत्री चिंतित हैं। इसको साफ करने की जिम्मेदारी उन्होंने एक मंत्री को सौंप दी है। लेकिन सच यह है कि धरातल पर इसका लाभ अब तक नहीं दिख सका है। पिछले दिनों जब लोगों से यह अपेक्षा की गई कि अब शुद्धि और उद्धार के लिए अस्थियां गंगा में नहीं डाली जाएंगी, तब उसका विरोध भाजपा के गोरखपुर के सांसद ने यह कहकर किया कि यह तो हमारी धार्मिक आस्थाओं और संस्कारों में सीधे-सीधे दखलंदाजी है, जिसे हम स्वीकार नहीं करेंगे।
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लोगों का यह मानना है कि जीवन से लेकर मृत्यु तक गंगा हमारे पवित्र होने की कल्पनाओं से जुड़ी हुई है। शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक गंदगियों को हम यहीं धोना चाहते हैं, मगर सरकार राजकोष से इसकी सफाई कराना चाहती है। मूल दोषी तो सरकार है, जिसने जगह-जगह बांध बनाकर इसके प्रवाह को रोककर इसका पानी नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए प्रयोग करना आरंभ किया। गंगा के किनारे जो फैक्टरियां लगी हैं, उनके लाइसेंस आखिर किसने बांटे हैं? अब तो गंगा लगातार सिमटती जा रही है, और हम उस युग के गंगाजल की खोज करने निकले हैं, जब उस पर पुलों की संख्या भी विरल थी और उसकी राहों में रुकावटें भी नहीं थीं।

सभी प्रमुख नगरों का विकास नदियों के किनारे हुआ है। यह विकास यात्रा किसी योजना पर आधारित नहीं, बल्कि तत्कालीन सुविधाओं से जुड़ी थी। मगर अब तो हमने इन नगरों तक पहुंचने के लिए रेल, विमान और यातायात, परिवहन तथा संचार माध्यमों का जाल बिछा रखा है। जब शहरों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है, तो अपनी सुविधाओं के लिए वह नदियों का प्रयोग करेगी ही। इसलिए यदि वैज्ञानिकों की दृष्टि में गंगा का जल पीने योग्य भी नहीं रह गया है, तो क्या इसकी सफाई के लिए कोई उल्टी प्रक्रिया आरंभ करनी चाहिए, क्योंकि हम विकास जनित दोषों से मुक्ति के लिए न तो पर्यावरण को शुद्ध रख पा रहे हैं और न नदियों एवं जनस्रोतों को? आलम यह है कि जलस्तर निरंतर नीचे की ओर जा रहा है, और हम पानी के मुफ्त प्याऊ केंद्र के बजाय बोतलबंद पानी को दूध के भाव बेचने पर उतारू हैं। हमारे इन लक्ष्यों के परिणाम हमें किस ओर ले जाएंगे?
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असल में, गंगा का स्वतः विस्तार संभव नहीं है, इसलिए हम जनता में बलवती श्रद्धा भावना का लाभ उठाने के लिए निरंतर प्रचार कर रहे हैं और सरकारी धन सफाई के नाम पर बहा रहे हैं। इसका लाभ अंततः समाज के उच्च वर्गों को पहुंच रहा है, जो इस अभियान के नायक अथवा संचालक के रूप में लगे हैं।

हमें समझना होगा कि इस देश में सिर्फ एक गंगा नहीं है, अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नदियां हैं, जिन्हें देशवासी गंगा से कम नहीं मानते। सवाल उनकी सफाई का भी है। हम अधूरे मन से गंगा को पवित्र कर और दूसरी नदियों और गंदगियों के प्रति उपेक्षा जताकर आखिर क्या हासिल कर पाएंगे? वास्तविक प्रश्न यह भी है कि हम गंगा की पवित्रता के लिए जो स्वच्छता अभियान चलाना चाहते हैं, उसे हमने जीवन में आखिर कितना अपनाया है। यदि हम अपने जीवन को, जिससे यह समाज बनता है, पवित्रता का वाहक नहीं बना पाते, तो यह प्रयत्न कैसे सफल हो पाएगा!
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