आम आदमी पार्टी मीडिया की बदौलत जन-जन में आज इस कदर पॉपुलर हो चली है कि इस आप में हर कोई खुद को शामिल मानकर खास हुआ लगता है। चुनाव चिह्न झाड़ू का योगदान इसको दूसरी राजनीतिक पार्टियों से अलग पहचान देता है। अब तक आप के चाल, चेहरा और चरित्र से साबित हो रहा है कि इसका टटकापन पुरानी, जर्जर राजनीतिक पार्टियों से उकताई पब्लिक के दिल-ओ-दिमाग में ताजा रक्त संचार की प्रतीति करा रहा है।
यह क्रांति हुई है, क्रांति शब्द हिंसात्मक लगे, तो कह सकते हैं कि यह बदलाव का आगाज है। भले यह फिलवक्त दिल्ली प्रदेश की सीमा में बदलाव लगे, लेकिन इसका फैलाव समूचे लोकतंत्र में अवतरित लगता है। मानो गीता में श्रीकृष्ण का कथन संभवामि युगे युगे प्रमाणित होने को है।
परिवर्तनशील इस युग में हिंदुस्तान का अवाम इस आप को तभी अपने अनुकूल मानेगा, जब इसे घाघ किसिम के राजकीय दलवीरों के चक्रव्यूह को भेदकर लोकानुरूप रहने देने का अनुमोदन दिल से दिया जाए। दिल्ली के वोटरों ने दिल्ली के इन सप्तर्षियों या मंत्रियों की मंचीय मंत्रणा सुनकर आश्वस्त भाव से इन्हें चने के नहीं, कहें कि गन्ने के झाड़ पर चढ़ा तो दिया, लेकिन राजकीय भाषा से बचकर, देह की भाषा से भी यह जतलाते रहना जरूरी होगा कि इनकी चुटीली बोली के साथ-साथ चेहरों की विद्रूप मुस्कान भी राजनेताओं की-सी हिप्पोक्रेट, उपहासकारी एवं अहंकारी न लगे। वर्ना इनके वायदे हवाई हो जाएंगे और आप धराशायी।
प्रेस के प्रश्नों की मार एवं कैमरों के यथार्थ चित्रण इतने भी उपेक्षित न किए जाएं कि आप की सादगी से ओढ़ी हुई दिखावट के नीचे-पीछे अवांछित भाव पकड़ में आ जाएं, कि मुखौटे खुल-खुल जाएं, सत्तासीन राजनेताओं के चेहरों से वकीलों वाली तिरछी सिंबल मुस्कान झलक-झलक जाए, कि आप के इर्द-गिर्द मौकापरस्त लोगों की भीड़ लग जाए, बम-पटाखों के धुएं की झड़ी लग जाए और लड्डू-बर्फी से गाल भरकर, फूल-पत्तों की गोलाकार विशाल माला के बीच मुंडीक्षेप कराकर फोटो खिंचवाने की तमन्ना लिए हुए नचैये-भूतगणादि के हो-हो-कारों से आप की सादगी प्रदूषित हो जाए।
ऐसे दृश्य नुक्कड़ नाटक का आभास तो दे सकते हैं, उपयोगी संदेश और शिष्ट शिक्षा नहीं। ऐसे उबाऊ रस्म-रिवाजों पर भी झाड़ू फेरने से आप की परिपक्वता साबित हो, तो क्या कहने!