वाम मोर्चा एवं कांग्रेस की संभावित आपसी समझ पर, जो गर्मियों में होने वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में इन दलों के बीच सीटों के बंटवारे की राह प्रशस्त कर सकती है, फिलहाल अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। अनिश्चितता के ऐसे में हालात में तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शांत बैठी हैं। अगर उनके दो प्रमुख विरोधी दल एकजुट नहीं होते, तो फिर ऐसा कोई नहीं जो उन्हें मसनद-ए बांग्ला से उतार सके। कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा कराए गए एक गुप्त सर्वे से, जिसे संभवतः राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के किसी करीबी ने फंड किया है, संकेत मिले हैं कि वाम-कांग्रेस के बीच चुनाव से तीन महीने पहले सीटों के बंटवारे पर सहमति बन जाती है, तो इस गठबंधन को 161 सीटें मिल सकती हैं। सर्वे के मुताबिक, 292 सदस्यों की विधानसभा में ममता को ऐसे में 126 से अधिक सीटें नहीं मिल पाएंगी। सड़कों पर धरना-प्रदर्शनों के जरिये मीडिया का ध्यान खींचने में जुटी भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश प्रमुख 'द्रोपदी' रूपा गांगुली के प्रभाव के बावजूद भाजपा का संघर्ष दहाई के आंकड़े तक पहुंचने के लिए ही होगा। 'मां दुर्गा' की तरह सुंदर एवं उग्र बंगाली महिला दिल्ली और नागपुर में बैठे हिंदुत्व के मुख्य पुरोहितों की नजर में भले ही खास हो, पर उनके पास 'मां काली' जैसी ममता की बराबरी करने के लिए सांगठनिक शक्ति नहीं होगी, तो भगवा बिग्रेड को ओलंपियन मिल्खा सिंह या पीटी ऊषा की तरह चौथे स्थान से संतोष करना पड़ सकता है।
वर्ष 2001 में हुए चुनाव के दौरान मैं उस दौर के अनुभवी कांग्रेसी नेता और बाद में तृणमूल कांग्रेस से जुड़ने वाले अजीत पांजा से मिला था, ताकि उनका आकलन पता चल सके। अजीत बाबू, श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। अनुशासित माकपा के सामने अगर उनकी पार्टी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकी, तो इसके पीछे पार्टी संगठन ही था। कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद ममता का दावा था कि वह माकपा को पछाड़ देंगी। यह जानते हुए भी कि पार्टी की मुखिया नाराज हो सकती हैं, अजीत बाबू ने ममता के इस दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, 'मेरे बयान को लिख लो और इसे बीबीसी पर प्रसारित करो।' (मैं उस वक्त बीबीसी में था।)
अजीत बाबू ने कहा, 'मैं इसकी परवाह नहीं करता कि वह क्या सोचती हैं। बंगाल में पैंसठ हजार पोलिंग बूथ हैं, उनसे जाकर पूछो कि मतदान के दौरान कितने बूथों पर वह एक या दो पोलिंग एजेंट दे सकती हैं।' मैंने उन्हें तृणमूल और कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से बताया कि कम से कम सत्ताईस हजार बूथों पर उनके पोलिंग एजेंट रहेंगे। अजीत पांजा ने कहा, 'इसका मतलब है कि 60 प्रतिशत पोलिंग बूथों पर इनकी उपस्थिति नहीं होगी।' फिर उन्होंने अपनी बहू शशि पांजा (डॉक्टर और फिलहाल ममता के कैबिनेट में मंत्री) को बुलाकर कागज और कलम लाने को कहा। और उन्होंने कागज पर तारीख के साथ लिखकर दिया, 'मैं अजीत कुमार पांजा, भविष्यवाणी करता हूं कि तृणमूल और कांग्रेस गठबंधन 90 से अधिक सीटें नहीं जीत सकता।' अजीत बाबू ने मेरे साथ मौजूद अन्य तीन पत्रकारों को भी चुनौती देते हुए चुनाव के बाद फिर आने को कहा। और कहा, 'मेरी बात गलत साबित हो, तो मेरे कान काटकर कौओं को डाल देना।' कांग्रेस और तृणमूल गठबंधन को महज 87 सीटें मिल सकीं। इस कहानी का सार यह है कि हिंसा और बूथ कैप्चरिंग को, जिसके लिए बिहार बदनाम रहा है, बढ़ावा देने वाले बंगाल में चुनाव नहीं जीत सकते, जब तक कि पार्टी संगठन मजबूत न हो। 2001 में मिले सबक के बाद ममता को अपनी पार्टी को दुर्जेय बनाने में दस साल लग गए। अंततः उन्होंने माकपा को पछाड़ दिया।
हिंदुत्व के पुजारी बंगाल में अब भी अंधेरे में रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। सुश्री गांगुली उतनी बेहतर नेता नहीं हैं, जितने कि श्री गांगुली, जिन्हें पार्टी में शामिल करने की कोशिश विफल हो गई। रूपा गांगुली दुर्गा की तरह दिखती हैं, वह साहसी हैं, भीड़ जुटा लेती हैं, पर उनमें नेतृत्व और संगठनकर्ता के वे गुण नहीं हैं, जो सौरव गांगुली में हैं। सौरव स्मार्ट हैं और वह अभी राजनीति में नहीं आना चाहते। अभी भी वह ठेठ बंगाली अभिजात्य वर्ग का ही हिस्सा हैं, जो खाकी निक्कर में आरएसएस के संघचालक को उपहास भरी नजरों से देखता है। वह कोलकाता में नियमित काली मंदिर में पूजा करते हैं, लेकिन पाकिस्तान जाते हैं, तो शाहिद अफरीदी के घर में कबाब-बिरयानी भी खाते हैं। मैदान में भले ही वह अफरीदी और पाकिस्तान को चुनौती पेश करते हों, लेकिन मैच के बाद वह बंगाल के भद्रलोक का हिस्सा होते हैं, जिसे हिंदुत्व ब्रांड पर गहरा संदेह है। निश्चित तौर पर सौरव बीफ खाने के लिए हिंसा का समर्थन नहीं करते। यही कारण है कि वरुण गांधी और अमित शाह द्वारा उन्हें पार्टी में शामिल करने की कोशिश नाकाम रही है।
बिहार में सुशील मोदी के रूप में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद का एक चेहरा था, जिसे उपयोग न करने की कीमत उसे चुकानी पड़ी है। यदि असम में भाजपा ने कांग्रेस से पाला बदलने वाले हेमंत बिस्वास शर्मा को पार्टी में शामिल कर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल की मुश्किलें बढ़ा ली है, तो बंगाल में रूपा गांगुली के रूप में भाजपा के पास सुंदर चेहरा जरूर है, पर चुनाव का रुख बदलने की ताकत उनमें नहीं है। अब जबकि मोदी लहर का जादू गुजरात में भी घट रहा है, ऐसे में बंगाल से भला क्या उम्मीद की जा सकती है? 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां महज 17 प्रतिशत वोट मिले थे। चुनावी संघर्ष की लकीर बंगाल में अभी नहीं खिंची है। पर इतना तो साफ है कि वाम मोर्चा और कांग्रेस का गठजोड़ होता है, तभी वे ममता को चुनौती दे सकते हैं।
- सुबीर भौमिक बीबीसी से लंबे समय तक जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार और 'अगरतला डॉक्ट्रिन' के लेखक हैं