पाकिस्तान और भारत ने अपने कुछ श्रेष्ठ और उत्कृष्ट उच्चायुक्त नई दिल्ली और इस्लामाबाद भेजे हैं। संभव है कि दुनिया की दूसरी राजधानियों में भी ऐसा हो, मगर इन दो राजधानियों में जिस तरह की चुनौती होती है, वैसी दुनिया में कहीं और नहीं होती। बृहस्पतिवार की सुबह यह कॉलम लिखने से पहले मैंने भारतीय उच्चायुक्त अजय बिसारिया को ट्वीट किया कि उन्हें 'क्वाइट डिप्लोमेसी' करनी चाहिए और वाघा सीमा से होकर रूहअफ्जा शरबत की बोतलें भारत भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए, जहां रमजान के दौरान इसकी किल्लत हो गई है। मुस्लिम समुदाय महीने भर चलने वाले रोजे के दौरान पारंपरिक रूप से इफ्तार में इसे शामिल करते हैं।
मैंने वह ट्वीट भारत से ऐसी खबरें आने के बाद किया कि रमजान के महीने के दौरान वहां रूहअफ्जा की आपूर्ति कम हो गई है, जबकि पाकिस्तान ने इसकी आपूर्ति इस महीने खासतौर से दोगुनी कर दी है। किल्लत की खबरें पाकिस्तान तक पहुंचने के बाद सजग कारोबारी पाकिस्तानी हमदर्द के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी उस्मा कुरैशी ने कहा, 'रमजान के दौरान हम रूहअफ्जा और रूहअफ्जा गो की भारत को आपूर्ति कर सकते हैं। यदि भारत सरकार अनुमति दे तो हम आसानी से वाघा सीमा से ट्रकों में भरकर वहां भेज सकते हैं।' उनकी ओर से यह पेशकश ट्वीटर पर सक्रिय भारतीय पत्रकार शिवम विज की इस मुद्दे पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद आई। अजय बिसारिया बहुत मुश्किल दौर में पाकिस्तान आए हैं, जब दोनों देशों के संबंध सबसे निचले स्तर पर हैं। उनसे आप मिलें तो उन्हें आप बहुत सहज और मुस्कराते हुए पाएंगे। पाकिस्तान आने के बाद से उन्होंने कई मोर्चों पर 'क्वाइट डिप्लोमेसी' की पहल की है, जिनमें करतारपुर कॉरिडोर भी शामिल है, जिसके खुलने के लिए भारत में नई सरकार के गठन तक इंतजार करना होगा। मगर सरहद के दोनों ओर इसका निर्माण जारी है।
भारत और पाकिस्तान में दोनों देशों की साझा विरासत की अनेक चीजें हैं, जिनमें हमदर्द लेबोरेटरीज का रूहअफ्जा शरबत भी एक है, जिसका निर्माण दोनों देशों में होता है। पाकिस्तान ने हाल ही में रूहअफ्जागो बाजार में उतारा है, जोकि पुराने शरबत का सोडा वर्जन है और टीन के पैक में बिकता है। यह युवा पीढ़ी को लक्षित करके तैयार किया गया है, जिन्हें रूहअफ्जा का पारंपरिक स्वाद तो मिलेगा, लेकिन यह कार्बोहाइड्रेट युक्त शीतल पेय की तरह होगा।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि भारत में पाकिस्तान से आयातित रूहअफ्जा मिल तो जाएगा, मगर इसके लिए भारत की तुलना में अधिक दाम देने होंगे। वाघा अटारी सीमा पर से दोनों देशों के बीच आधिकारिक रूप से कुछ कारोबार तो हुआ है, लेकिन द्विपक्षीय तनाव का कारोबार पर भी असर पड़ा है। हालांकि दोनों ओर के कारोबारी दुबई के रास्ते से तस्करी के जरिये कारोबार करते हैं, जिससे दोनों सरकारों को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। कश्मीर में नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के कारोबार पर भारत ने इस शिकायत के साथ रोक लगा दी कि पाकिस्तानी पक्ष इसका दुरुपयोग करता है। रूहुअफ्जा मांग और आपूर्ति का एक उदाहरण है। यदि दोनों देश सहमत हो जाएं तो दूसरे सामान के कारोबार को उच्च स्तर तक पहुंचाया जा सकता है। यह देखा गया है कि खासतौर से टमाटर, केला और प्याज जैसी खाद्य सामग्री की आपूर्ति कम हो जाए, तो सरकार इन्हें भारत से आयात करने की मंजूरी देती है। लेकिन दीर्घकाल के हिसाब से देखें तो यह स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले उत्पादों की तुलना में महंगा पड़ता है।
इमरान सरकार बेनकाब
पाकिस्तान में राजनीतिक मोर्चे पर देखें तो इमरान खान सरकार पूरी तरह से बेनकाब हो चुकी है, क्योंकि रोजमर्रा के कामकाज निपटाने के लिए इसके पास योग्य व्यक्ति नहीं हैं। इमरान खान ने इस्लामाबाद पहुंचकर सरकार बनाने के लिए विपक्ष में रहते हुए बीस वर्ष इंतजार किया। लेकिन उनके मंत्रिमंडल में शामिल अधिकांश मंत्री अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रहे हैं और हाल ही में उन्हें अपने वित्त मंत्री को हटाना पड़ा, क्योंकि देश की आर्थिक स्थिति ऐसे समय वाकई बहुत खराब है, जब सरकार आईएमएफ के साथ नए समझौते के करीब है। हाल ही में मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में इमरान खान को संसद से बाहर के टेक्नोक्रेट्स और सलाहकार नियुक्त करने पड़े, जिनमें से अधिकांश आसिफ अली जरदारी, नवाज शरीफ और जनरल परवेज मुशर्रफ की सरकारों के समय सेवा दे चुके थे। यदि कोई मंत्रिमंडल की बैठक की तस्वीर पर गौर करे, तो पता चलता है कि इसमें बहुत कम मंत्री मूलतः पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी के हैं, जबकि बिना चुनकर आए लोग अधिक हैं, जिनमें से कई अत्यंत विवादास्पद रहे हैं। संसद से बाहर के मंत्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
नए गृह मंत्री रिटायर्ड ब्रिगेडियर एजाज अहमद शाह पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने तीखा हमला किया है। बिलावल ने आरोप लगाया है कि गृह मंत्री उनकी मां बेनजीर भुट्टो की हत्या में शामिल थे। सवाल पूछे जा रहे हैं कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान परोक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन की ओर तो नहीं आगे बढ़ रहा है? जाने माने राजनीतिक विश्लेषक और मानव अधिकार कार्यकर्ता आई ए रहमान कहते हैं, मंत्रियों के पद नेशनल एसेंबली के सदस्यों के लिए आरक्षित रखने के पीछे की सोच बहुत स्पष्ट है। किसी भी लोकतंत्र में मंत्रिपरिषद के नेता को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि उन्हें मतदाताओं के संपर्क में रहना चाहिए, जिन्होंने उन्हें चुना है और जिनके प्रति वह जवाबदेह हैं, जबकि एसेंबली के बाहर के सदस्य ऐसे किसी लोकतांत्रिक अनुशासन से नहीं बंधे होते। वास्तव में इमरान खान को स्पष्ट तौर पर नीतिगत दिशा और नेतृत्व के गुणों की जरूकत है, ताकि वह पाकिस्तान को मौजूदा स्थिति से बाहर निकाल सकें। इसमें पुराने टेक्नोक्रेट्स उनकी कोई मदद नहीं कर सकते।