लोकसभा चुनाव-2019 में कैसी है 'पुरबिया बयार'? लोकसभा चुनाव में वाराणसी और पूर्वांचल से सटे इलाकों व उत्तर प्रदेश के गांव, कस्बों शहरों में इस बात का अंदाजा लगाने की कोशिश की कि क्या इस बार भी 2014 की तरह कोई राजनीतिक बयार चल रही है। कुछ नए प्रस्तावित मुद्दे, जैसे कि, राष्ट्रीय सुरक्षा पर जनमत एकाग्रचित्त हो चला है, या कहीं केवल जातिगत समीकरण स्थानीय रूप धारण कर राजनीति की चर्चा पर पर्दा डाल रहे हैं।
सबसे पहले बात करते हैं, बनारस की। यहां कई वादे किए गए, कि यह शहर क्योटो जैसा बन जाएगा, स्वच्छता का मॉडल बनेगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सांसद होने के नाते सीधा संवाद होगा और नौजवानों की आकांक्षाओं को पर लगेंगे। शहर में हर कोई कहता है कि यहां से तो मोदी ही जीतेंगे। मुद्दों पर बहस करें, तो ऐसे लोग भी मिलते हैं, जो कहते हैं कि कुछ खास काम नहीं हुआ है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उत्साह का माहौल है, क्योंकि प्रधानमंत्री ने महामना मदन मोहन मालवीय के नाम और परिवार का उचित सम्मान किया है। लेकिन विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों से चर्चा करने पर वह दबी जुबान से बताते हैं कि उन पर काफी अंकुश लगा है।
बिहार के सीवान जिले के सुनील पासवान बीएचयू में भूगोल विषय के छात्र थे और परास्नातक के बाद उन्हें जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिली। लेकिन उनके लिए आगे के दरवाजे बंद होने लगे, क्योंकि पीएचडी में सीटें कम कर दी गईं। उनका मानना है कि जिनकी पहुंच है और जो प्रोफेसरों को पहचानते हैं, वही यहां से आगे बढ़ पाते हैं। ऐसे तमाम छात्र हैं, जो यहां से पढ़कर समाज में कुशल पेशेवर बनना चाहते हैं। लेकिन इनके मामलों की सुनवाई नहीं की जाती है, और किसी मुद्दे को वे उठाना चाहें, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई का भय रहता है। स्पष्ट है कि नौजवानों की आकांक्षाओं और रोजगार की चर्चा करते हुए 2014 की जो 'पुरबिया बयार' बनी थी, उन पर संवाद की संभावना अब नहीं है।
भदैनी की आेर जाने वाली सड़क पर रस्सी और दातून बेचने वाले दुकानदार से जब सफाई व्यवस्था पर बात की तो उसने कहा, 'खुदै जाके अंदर गलियन में देख ला।' अस्सीघाट पर सड़क पर सार्वजनिक शौचालय, प्रवासी भारतीय दिवस की होर्डिंग्स के पीछे छुपा दिए गए हैं। नए अच्छे सार्वजनिक शौचालय दिखाई नहीं दे रहे हैं। मैं वैज्ञानिक नहीं हूं, पर गंगाजल का रंग काईनुमा हरा दिखाई देता है। गंगा घाटों के किनारे प्लास्टिक के ढेर लगे हुए हैं, हालांकि दशाश्वमेघ घाट पर शाम की गंगा आरती में रौनक दिखती है।
नाविक गोपाल मांझी बताते हैं, कि विदेश से लाया गया एक लग्जरी बजरा भी अब बनारस की गंगा में चलता है! नाव में बैठे एक बंधु कहते हैं, कि गरीबी उन्मूलन हो न हो, बनारस में अब अमीरी प्रबंधन पर विशेष बल है। लंका से गोदौलिया पहुंचें, और काशी विश्वनाथ के दर्शन को घुसते ही नई प्रबंधन व्यवस्था दिखाई देती है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए ढहाए गए पड़ोसी मंदिरों के मलबों की सफाई की जा रही है। कुछ लोग बताते हैं कि इर्द-गिर्द के अतिक्रमण को दूर करने के लिए इनको ढहाना आवश्यक था। पंद्रहवीं सदी के आसपास बनी कई इमारतें अब ढहाई जा चुकी हैं। अयोध्या से पहले काशी विश्वनाथ में एक भव्य मंदिर का अब बन जाना लगभग तय है।
शहर से ग्रामीण क्षेत्रों में जाने पर पता चलता है कि वहां रोजगार, गांवों के सौंदर्यीकरण की कोई चर्चा नहीं हो रही है। लखनऊ से बनारस के रास्ते में अमेठी के कमालगंज ब्लॉक में एक हेलीकॉप्टर के उतरने की तैयारी हो रही थी। पूछने पर पता चला कि हार्दिक पटेल यहां एक सभा को संबोधित करने वाले हैं। गांव में बातचीत के दरमियान यह दिखा कि यहां की पटेल बिरादरी हार्दिक को सुनने के लिए इकट्ठा है। गुजरात के पटेल और उत्तर प्रदेश की पटेल जाति दोनों आर्थिक पायदान के दो सिरे पर हैं, सामाजिक तौर से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन पटेल सरनेम के आधार पर शायद किसी तरह अखिल भारतीय राजनीतिक संवाद स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। सभा में अल्पसंख्यक व दलित दोनों मौजूद हैं। चर्चा किसानी के मुद्दों पर है। हार्दिक की बात लोग सुनते जरूर हैं, लेकिन उनके मुद्दे हार्दिक के भाषण से भिन्न हैं। प्रेम कली कहती हैं कि रहने को छत नहीं हैं, छप्पर के नीचे खाना बनाती हैं। ज्यादातर लोगों के लिए बड़ा मुद्दा गरीबी है।
कहीं न कहीं सभी राजनीतिक दल जमीनी मुद्दों से कतरा रहे हैं और शब्दों की लड़ाई में जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।ज्यादातर जगहों पर मुद्दों में समानता है। मोहनलालगंज संसदीय क्षेत्र के जबरौली गांव में महिलाएं बताती हैं कि उज्जवला योजना में सिलेंडर मिला था, लेकिन अब यह भरा नहीं जा रहा है। कयास लगाये जा रहे हैं कि मौर्य समुदाय के वोट भाजपा को जाएंगे। दबी जुबान से कई लोग कहते हैं कि भाजपा उनकी मजबूरी बन गई है। बताते हैं कि दो हजार रुपये तो मिले हैं, लेकिन किसानी ठप हो जाने के घाटे की पूर्ति इससे नहीं हो सकती। दलित मतदाताओं का 2014 में भाजपा की तरफ झुकाव कुछ मत्वपूर्ण वादों पर था, लेकिन महंगाई पर अब कोई चर्चा नहीं करता, जबकि रोजगार के मुद्दे पर निराशा छाई हुई है।
इस पूरे माहौल में लहर जैसी कोई चर्चा नहीं हो रही है। बक्सी का तालाब, मलिहाबाद इन सभी इलाकों में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा पुरजोर है। वोटिंग भले ही जातिगत समीकरणों पर हो, लेकिन निराशा का कारण यह है कि लोकहित के लिए किए गए अनेक वादे पूरे नहीं हो पाए हैं। और वर्तमान परिस्थिति की दिक्कतों के लिए कल्याणकारी योजनाएं काफी नहीं दिख रही। दबे कुचले वर्ग की आवाज, अगड़ी जातियों की तरह प्रबल भले न हो, लेकिन वोट उनका आसरा है। इस चर्चा के बीच वह फिर से कमल का बटन दबाएंगे या गठबंधन की तरफ आकर्षित हैं, इस पूरी राजनीतिक चर्चा को सूक्ष्मता से समझना होगा, बहरहाल निर्णायक तर्क तो अब 23 मई के बाद निकलेंगे।