जो भी हो, उम्मीद यही है कि जीएसटी दरों में कटौती से मांग बढ़ेगी और विकास को गति मिलेगी। हालांकि, यह कई कारकों पर निर्भर करता है। वैसे बजट 2025 में कर राहतों से उपभोग में वृद्धि का अभी तक पता नहीं चला है। सरकार को इससे अनुमानित 48,000 करोड़ रुपये की राजस्व हानि होगी, लेकिन इससे 330 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। अक्सर, राजनीतिक मंशा अपेक्षाओं के शोरगुल के आगे दब जाती है। उम्मीद है कि सरकार टैरिफ संकट की अनिश्चितता से पैदा हुए इस अवसर को नहीं गंवाएगी। जीएसटी दरों में कटौती लोगों के उत्साही मिजाज का लाभ उठाने और रोजगार, आय व निवेश को बढ़ावा देने के लिए गहन सुधारों को आगे बढ़ाने का एक अवसर प्रदान करती है।
ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ के अलावा, अमेरिका को भारतीय निर्यात की चुनौती उन दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों से और भी बढ़ जाती है, जिनका जिक्र इस कॉलम में पहले भी किया जा चुका है। राजनीति द्वारा लगाई गई आर्थिक लागत भारतीय निर्यात को कम प्रतिस्पर्धी बनाती है। वियतनाम, श्रीलंका या बांग्लादेश पर अमेरिका द्वारा लगाए गए कम टैरिफ के कारण भारत में निवेश करना कठिन हो गया है। अनुमान है कि अमेरिका को भारत से होने वाले 48-60 अरब डॉलर के निर्यात पर टैरिफ लग रहे हैं। इससे सबसे ज्यादा नियोक्ता प्रभावित होने वाले हैं। यह समस्या तमिलनाडु के तिरुपुर से लेकर उत्तर प्रदेश के नोएडा और गुजरात के सूरत तक है, जो हस्तशिल्प, कालीन, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान और आभूषण जैसे क्षेत्रों में भारतीय निर्यात को प्रभावित कर सकती है। रत्न-आभूषण तथा कपड़ा क्षेत्र कुल मिलाकर पांच करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा इन क्षेत्रों के लिए राहत और संसाधन जुटाने की जरूरत है। हालांकि, निर्यातकों को राहत देने के लिए सरकार के पास गुंजाइश कम है-राजकोषीय घाटे को 4.4 प्रतिशत तक लाने की प्रतिबद्धता और एसएंडपी द्वारा हाल ही में रेटिंग में सुधार से उपलब्ध होने वाले धन की मात्रा का पता चलेगा। इससे परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण और विनिवेश पर ध्यान जाता है। नीति आयोग ने मुद्रीकरण के लिए छह लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं की पहचान की है।
2025 के बजट में 10 लाख करोड़ रुपये के नए परिसंपत्ति के मुद्रीकरण का लक्ष्य रखा गया है। सरकार को पहले प्राप्त राशि का खुलासा करना होगा, उसके उपयोग पर चर्चा करनी होगी और नए लक्ष्य के लिए एक समय-सीमा निर्धारित करनी होगी। पैसा जुटाने का सबसे बड़ा अवसर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सरकारी हिस्सेदारी का मूल्य बढ़ाना है। उदारीकरण के तीन दशक बाद भी, भारत सरकार सबसे बड़े व्यावसायिक घरानों में से एक बनी हुई है! पहले भी इस कॉलम में बताया गया था कि सरकार की पूंजी को अमृत काल निधि नामक एक संप्रभु कोष में रखा जाए, जिसका उपयोग संसाधन जुटाने के लिए किया जा सके। विक्टर ह्यूगो के शब्दों में कहें, तो यह एक ऐसा विचार है, जिसका समय आ गया है।
गौर कीजिए कि सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का कुल बाजार मूल्य 34.33 लाख करोड़ रुपये है और सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बाजार मूल्य 15.9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। एलआईसी, जीआईसी, आरवीएनएल, आईआरएफसी, मझगांव डॉक्स और कई बैंकों जैसे उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है। अगर सरकार अपनी 51 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी किसी फंड में जमा कर दे और उसे भारत फंड के रूप में बाजार में पेश करे, तो इससे डीमैट खाते खोलने के लिए उत्सुक निवेशकों को विकल्प मिलेंगे, राहत की गुंजाइश बनेगी और कुछ समय में बुनियादी ढांचे के लिए अच्छी-खासी रकम जुटाई जा सकेगी।
भारत की अर्थव्यवस्था व्यवस्थागत सुस्ती, पुराने कानूनों और नियामकीय जंजीरों में जकड़ी हुई है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024 ने विकास की एक रूपरेखा प्रस्तुत की है, जिसमें विनियमन-मुक्ति की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। सितंबर 2025 में भी इस विचार पर समितियों में बहस चल रही है। निवेशक राज्यों की राजधानियों और दिल्ली में परमिट के लिए कतारों में खड़े हैं। व्यवसायों को ढेर सारे अनुपालन नियमों का सामना करना पड़ रहा है। अभी जिस जीएसटी प्रणाली की सराहना की गई, वह अब भी उपकर, उल्टे शुल्क, वर्गीकरण और कारावास के खतरे से बंधी हुई है। व्यवसायों को नियंत्रित करने वाले 1,843 से अधिक कानूनों में से 800 से अधिक में कारावास की सजा का प्रावधान है। कुछ प्रावधानों को अपराधमुक्त करने का वादा अब तक एक विधेयक ही है।
ट्रंप के टैरिफ के खतरे के चलते नए बाजारों में विस्तार की जरूरत है। सैमसंग, सोनी, टोयोटा और श्याओमी ने वैश्विक ब्रांडों के जरिये अपने देशों के लिए बढ़त हासिल की है। भारतीय कंपनियों को अपना पैमाना और विशिष्ट गुणवत्ता बनाने में काफी संघर्ष करना पड़ा है। प्रणालीगत कठोरता से लेकर खराब ऋण बाजार तक कई कारणों में से एक कारण अनुसंधान एवं विकास में निवेश की कमी है। वैश्विक बढ़त के लिए यह बेहद जरूरी है। फिर भी निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास के लिए बजट में निर्धारित 20,000 करोड़ रुपये अब तक वितरित नहीं किए गए हैं। ‘एक जिला, एक उत्पाद’ का विचार उत्पादन और निर्यात में विविधता लाने के लिए बनाया गया था, पर यह लड़खड़ा रहा है। विश्व व्यवस्था तेजी से बिखर रही है। भारत के राजनीतिक वर्ग को अपने आसपास देखना होगा और खतरे की अनदेखी बंद करनी होगी। आर्थिक संकट के चलते ही लोकतंत्रों में संघर्ष, फूट और उथल-पुथल होते हैं।