चुनाव का बिगड़ैल मौसम है। नेताओं की आवाजाही बढ़ गई है। किसी चुनाव प्रत्याशी से पूछो कि चुनाव जीत गए, तो क्या करोगे? उसका एक ही उत्तर है कि विकास करेंगे। मैं पूछता हूं कि विकास क्या होता है, तो वे दाएं-बाएं झांकते हैं। मैं कहता हूं कि चलिए, कोई बात नहीं, आप विकास का मतलब नहीं समझते होंगे। लेकिन यह तो बताइए कि विकास करेंगे कैसे?
इस पर वे मुझे अज्ञानी समझ कर हंसते हैं, और कहते हैं कि यह भी कोई पूछने की बात है। आजादी के बाद से जैसे विकास हो रहा है, वैसे ही करेंगे। मैं कहता हूं कि आजादी के बाद वाले विकास में तो घोटाले भी होते रहे हैं। उनका कहना है कि हम घोटालों की जांच करवाएंगे, लेकिन विकास का काम अधूरा नहीं छोड़ेंगे। देश को विकास की आवश्यकता है। इसलिए मैंने अपने बेटे विकास को ही चुनाव में उतार दिया है।
पर यह तो वंशवाद है, मेरा जवाब था।
यह वंशवाद नहीं, विकास है, नेताजी का जवाब था।
मैंने कहा कि फिर तो हमें गरीबी, महंगाई और बेकारी से भी मुक्ति मिलेगी?
नेताजी ने कहा, अब कही आपने सही बात। इन्हीं से तो हम लड़ रहे हैं। हम चुनाव इसलिए लड़ते हैं, ताकि इनको समाप्त किया जा सके। मान लीजिए, मैंने चुनाव में कुछ लाख रुपये खर्च किए, तो अगले पांच वर्ष में इनमें तीन या चार शून्य जोड़कर मैं अपना और देश का विकास ही तो करूंगा।
मैंने कहा कि मैं आपका आशय समझा नहीं। वह बोले, आप कैसे आदमी हैं, जो विकास का मतलब ही नहीं समझते। अगर दस लाख रुपये कुछ वर्ष में एक करोड़ हो जाते हैं, तो यह विकास ही तो हुआ। अब मेरा माथा ठनका। मैंने कहा, नेताजी, विकास करने का मतलब यह तो नहीं कि सारे नेता मिलकर अपना घर भरें। वह बोले, आप बात समझते हैं, पर उसका मर्म देर से समझ में आता है। हम चुनाव के बाद विकास जरूर करेंगे, आप देख लेना।
यह कहकर नेताजी चले गए और मैं खड़ा-खड़ा घंटों सोचता रहा।