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बढ़ती बेरोजगारी है बड़ी चुनौती

Mon, 18 Sep 2017 06:57 PM IST
अनन्त मित्तल
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अनन्त मित्तल
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देश में हर महीने दस लाख लोग रोजगार मांगने की कतार में आ जुड़ते हैं। पर नए रोजगार पैदा होने की दर जब सालाना बीस लाख के नीचे ही अटकी हुई हो, तो नतीजा क्या होगा? 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने युवाओं से सालाना एक करोड़ नए रोजगार पैदा करने का वायदा किया था। पिछले तीन साल में उनकी सरकार 60 लाख रोजगार भी पैदा नहीं कर पाई। कृषि और गैर कृषि, दोनों क्षेत्रों में रोजगार पैदा होने के हालात अच्छे नहीं हैं। ‘मेक इन इंडिया’ को लोकप्रिय बनाने के प्रयासों के बावजूद यह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई। सूखे के हालात से हलकान किसानों को कर्ज माफी का झुनझना थमाने के बावजूद स्थिति सुधर नहीं रही। गाय और अन्य मवेशियों की खरीद-फरोख्त का कारोबार ठप होने से पशुपालक बेरोजगार हैं। मरे जानवरों की खाल निकालने के पारंपरिक धंधे से तौबा करने से चमड़ा उद्योग में छंटनी हो रही है। नोटबंदी का असर लघु उद्योगों से लेकर कृषि क्षेत्र तक पर पड़ा, जिससे अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर लगातार चार तिमाही तक घटती गई।
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नरेंद्र मोदी की तरह इंदिरा गांधी भी 1971 के चुनाव में जबर्दस्त बहुमत लेकर सत्तारूढ़ हुई थीं। उसके बाद बांग्लादेश बनवाने में सफलता और पाकिस्तान पर जीत, सफल परमाणु परीक्षण तथा सिक्किम के भारत में विलय जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियों के बावजूद रोजगार पैदा करने में नाकामी उनके लिए ग्रहण साबित हुई। साफ है कि चुनाव में रोजगार निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

देश में आज हर महीने दस लाख नए रोजगारों की मांग है, पर उसका 10 से 20 फीसदी भी पैदा नहीं हो पा रहा। उद्योगों में बढ़ रही ऑटोमेशन के मुकाबले के लिए सरकार अपने कामगारों को नई प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित करने में भी पिछड़ रही है। सरकार का प्रचार तंत्र हालांकि मुद्रा कर्ज योजना के तहत लघु उद्यमियों और स्वरोजगारी ठेली-खोमचे वालों को बड़े पैमाने पर कर्ज देकर साढ़े पांच करोड़ नए रोजगार पैदा करने का दावा कर रहा है, पर असलियत से प्रधानमंत्री वाकिफ हैं! इसीलिए वह बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को जल्दी पूरा करने, नई परियोजनाएं शुरू करने, रेलवे में निजी पूंजी निवेश कराने तथा बुलेट ट्रेन और मध्यम आकार की रक्षा उत्पादन परियोजनाओं को जल्दी अंजाम देने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं।
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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी रोजगार को मौजूदा सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताया है। उन्होंने बुनियादी ढांचा, बिजली और निर्यात  पर खास ध्यान देने का सुझाव दिया है। निर्यात के मोर्चे पर हमारी विफलता गले नहीं उतरती, क्योंकि एशिया के अन्य देशों से तो निर्यात बढ़ रहा है। क्या कुटीर, सूक्ष्म और लघु उद्योग नोटबंदी की मार से उबर नहीं पाए?

देश में बेरोजगारी की दर साढ़े चार फीसदी हो गई है। उसमें भी बेरोजगारी शहरी क्षेत्रों में ज्यादा है। उधर ग्रामीण इलाकों में सूखे और बाढ़ के भंवर में फंसी खेती-किसानी में भी रोजगार नहीं है। खरीफ फसल की बुआई भी पिछले साल के मुकाबले 0.6 फीसदी कम क्षेत्र में हुई है। साल भर से रोजगार पैदा होने की दर घटने और यही स्थिति अगले साल भी जारी रहने की अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की आशंका और भी चिंताजनक है। जिस देश में बेरोजगारों की संख्या तीन करोड़ का आंकड़ा छू रही हो, वहां इतने सारे श्रमिकों का बेरोजगार हो जाना और फिर निराश होकर नया काम भी नहीं तलाशना जाहिर तौर पर सरकार के लिए खतरे की घंटी है।
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