दरअसल, तेजी से बदल रहे वैश्विक परिदृश्य में हिंद-प्रशांत क्षेत्र का रणनीतिक व आर्थिक महत्व जिस तरह से बढ़ा है, और चीन के नौसैनिक बेड़े के लगातार विस्तार ने क्षेत्र के अस्थिर होने की आशंकाएं भी बढ़ाई हैं, उसमें आईएनएस सूरत, नीलगिरी और वाघशीर का नौसेना में शामिल होना देश की सुरक्षा के लिहाज से अहम होने के साथ सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत को भी रेखांकित करता है।
उल्लेखनीय है कि इनमें से आईएनएस सूरत विश्व के सबसे बड़े और विध्वंसक जहाजों में से है, जो देश के समुद्री क्षेत्र में किसी भी संभावित खतरे को नष्ट करने की क्षमता रखता है। जबकि, आईएनएस नीलगिरी और आईएनएस वाघशीर क्रमश: अत्याधुनिक फ्रिगेट और पनडुब्बी हैं, जो लंबे समय तक समुद्र में रहने व शत्रु की गतिविधियों पर नजर रखने और समुद्र के भीतर छिपे खतरों से निपटने के लिए तैयार की गई हैं। वाघशीर की एक उल्लेखनीय खासियत है कि यह दुनिया की सबसे शांत पनडुब्बी मानी गई है।
दरअसल, इन तीनों का निर्माण कार्बन उत्सर्जन के वैश्विक पैमानों और ऊर्जा दक्षता को ध्यान में रखते हुए किया गया है, और इसका भी ख्याल रखा गया है कि समुद्र के भीतर पनडुब्बी आवाज न करे, जिससे यकीनन पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त, तीनों का निर्माण मुंबई में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) द्वारा किया जाना भी देश के लिए गौरवपूर्ण है, जिससे यह पता चलता है कि भारतीय नौसेना अब तकनीकी रूप से तो मजबूत हो ही रही है, यह भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक बड़ी उपलब्धि है। इससे पूरी दुनिया में यह संदेश भी जाता है कि भारत अपनी सीमाओं और समुद्री हितों की रक्षा करने में पूरी तरह से सक्षम है।
यही नहीं, आईएनएस सूरत व नीलगिरी, दोनों में महिला अधिकारियों व नाविकों को समायोजित करने की व्यवस्था है, जो निस्संदेह सैन्य भूमिकाओं में लैंगिक समावेशन की दिशा में एक प्रगतिशील बदलाव को ही दर्शाती है। जाहिर है कि आईएनएस सूरत, नीलगिरी और वाघशीर देश के समुद्री सुरक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति और सेनाओं के भीतर आधुनिकतम तकनीक और समावेशिता को अपनाने की प्रतिबद्धता के प्रतीक हैं, जो देश की नौसैनिक क्षमताओं को फिर से परिभाषित करने के लिए बिल्कुल तैयार हैं।