एक बड़े आदमी ने पिछले दिनों बिल्कुल सही कहा था कि भगवान भी उतर आएं, तो बलात्कार नहीं रुक सकते। जिस समाज में भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण होता रहे, गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे सम्मानित और शक्तिशाली लोग सिर झुकाए बैठे रहे, उसी देश की सच्चाई बयान की थी उन्होंने। आखिर पढ़े-लिखे आदमी हैं वह। वह तो द्वापर युग में श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने द्रोपदी की लज्जा बचाई थी। आज के यदुकुलशिरोमणि ऐसा नहीं सोचते। वैसे किसी को दोष देने से फायदा भी क्या। जब दुःशासन और द्रोपदी असंख्य हों और पांडव न्यूट्रल, तो कोई भला कर भी क्या सकता है! बूढ़े-पुराने इस जमाने को यों ही दोष नहीं देते।
जहां बलात्कार की सारी घृणा पीड़िता को मिले और बलात्कारी को बचाने की कोशिश हो, जहां गाल देखकर थप्पड़ मारा जाता हो, वहां कोई अगर कुछ उम्मीद करता है, तो यह उसकी मूर्खता है। आज का दौर तो ऐसा है कि देर रात कोई मदमस्त सांड किसी खेत में घुस जाए, तो सांड को खदेड़ने के बजाय खेत मालिक पर उंगली उठाई जाती है।
यहां तो शिकारी बाद में शिकार को पेड़ पर लटका देता है, ताकि आम जनता उससे डरे। हालांकि लोगों को इसे उतना सीरियसली भी नहीं लेना चाहिए कि ऐसा काम करने वालों के लिए सख्त सजा की मांग कर डालें। लड़कों से कभी-कभार गलती हो जाती है। इसका मतलब यह थोड़े ही न है कि उन्हें फांसी पर लटका दो!
ऐसा नहीं है कि औरतों के साथ होने वाले अत्याचार बंद नहीं हो सकते। बिल्कुल हो सकते हैं, बशर्ते समाज के बड़े लोगों द्वारा बताए गए नियमों के अनुसार चला जाए। मसलन, लड़कियां भड़काऊ वस्त्र कभी न पहनें, पास में मोबाइल न रखें, सिनेमा-टेलीविजन से दूर रहें, अकेले बाहर न निकलें, नौकरी न करें। अगर बाहर जाना बहुत जरूरी हो, तो पर्स में चार-पांच राखी अवश्य रखें। पहले जमाने की सती-साध्वी घरेलू महिलाएं कितने आराम से गृहस्थी चलाती थीं। आज की महिलाएं ऐसा नहीं करतीं, तभी तो यह सारा संकट है।