वर्ष 1970 में रजनी कोठारी की एक किताब प्रकाशित हुई, जिसका सीधा-सपाट शीर्षक था, 'भारत में राजनीति'। इस किताब का ज्यादातर हिस्सा उस समय प्रभुत्व रखने वाली कांग्रेस पार्टी को ही समर्पित था। कोठारी के मुताबिक, आजादी के पहले और उसके बाद कांग्रेस खुद को देश की आधिकारिक प्रवक्ता और बदलाव के ताकतवर एजेंट के तौर पर पेश करने में कामयाब रही थी। कांग्रेस के इस आधिपत्य की कई वजहे थीं।
दरअसल उस समय पार्टी की छाया तले कई तरह की विचारधाराओं को समान रूप से जगह मिली हुई थी। इसके अलावा देश के सभी राज्यों में इसकी मजबूत उपस्थिति भी थी। तमाम महान शख्सियतों का नेतृत्व इसे मिला हुआ था। गांधी, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल जैसी हस्तियां करिश्माई व्यक्तित्व और मजबूत चरित्र वाले नेता थे, जिन्होंने देश में राजनीतिक संवाद को आकार दिया। कांग्रेस की छाप इतनी गहरी हो गई थी कि इसके विरोधी भी कांग्रेस और उसके नेताओं द्वारा तय की गई विचाधारात्मक कसौटी के भीतर काम करने को मजबूर थे। कांग्रेस की आलोचना करने वाली ज्यादातर पार्टियों ने इसकी कल्याणकारी नीतियों, धार्मिक बहुलतावाद और विदेश नीति के मोर्चे पर गुट निरपेक्षता को अपनाया, तो इसकी यही वजह थी।
कोठारी ने यह किताब 1967 के चुनावों के बाद के उस दौर में लिखी, जब कांग्रेस के प्रभुत्व को देश भर में पहली बार गंभीर चुनौती मिली थी। उस वक्त कांग्रेस ने केंद्र में तो अपनी लाज बचा ली थी, मगर आठ राज्यों में उसे हार का सामना करना पड़ा था। कोठारी के मुताबिक, इसके बावजूद कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी रही। दरअसल, जिन आठ राज्यों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था, उनमें से छह में सरकार का नेतृत्व उनके हाथों में था, जो पहले कांग्रेसी थे।
किताब के अंत में कोठारी एक निष्कर्ष और एक भविष्य कथन पर पहुंचते हैं। उनका निष्कर्ष था, 'चूंकि कांग्रेस लगातार सत्ता में रहने में कामयाब रही, और इसको चुनौती देने वाली कोई असरदार ताकत भी नहीं थी, इसीलिए देश की राजनीतिक प्रक्रिया के प्रवाह और एकता में बाधा नहीं आई।' वहीं उनकी भविष्यवाणी थी, 'यह उम्मीद की जा सकती है कि लंबे समय तक कांग्रेस देश की सबसे व्यवस्थित पार्टी बनी रहेगी। साथ ही, पूरे देश में और स्थानीय स्तर पर भी इसका असर बना रहेगा। आने वाले समय पार्टी का संचालन दो तरह से होगा। पहला, केंद्रीय स्तर पर यह सर्वसमावेशी पार्टी बनी रहेगी, इस कारण गठबंधन बनाते हुए यह वर्चस्ववादी भूमिका में रहेगी। और दूसरा, राज्यों की सत्ता खोने के बावजूद स्थानीय स्तर पर इसके नियंत्रण और असर में कोई कमी नहीं आएगी।'
आज जब राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का असर अपने निम्नतम बिंदु पर पहुंच गया है, कोठारी की किताब में दिलचस्पी बढ़ना लाजिमी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा। वह महज 44 सीट हासिल कर पाई। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे जिन राज्यों में जहां कभी कांग्रेस को शासन का पर्याय माना जाता था, वहां इसका सफाया हो गया। जो आंध्र प्रदेश कभी उसका गढ़ था, आज वहां यह लगभग अदृश्य है। इस वर्ष होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी इसकी संभावनाएं धूमिल दिख रही हैं।
कांग्रेस की इस दुर्गति की वजह काफी हद तक वह खुद है। दरअसल पार्टी की हाईकमान संस्कृति ने इसकी राज्य इकाइयों को मजबूत बनने का मौका ही नहीं दिया। चूंकि मुख्यमंत्रियों और प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों की नियुक्ति और बर्खास्तगी का फैसला दिल्ली से ही करने का रिवाज है, ऐसे में, राज्यों में जमीनी स्तर पर प्रतिभावान नेताओं को तैयार करने के बारे में पार्टी ने कभी सोचा ही नहीं।
कोठारी की यह किताब जब प्रकाशित हुई थी, तब तक कांग्रेस एक पारिवारिक उद्यम में तब्दील नहीं हुई थी। और इसकी शुरुआत 1975 में तब हुई, जब इंदिरा गांधी ने अपने पुत्र संजय गांधी को बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपी। तब से लेकर आज तक (1991-98 का दौर छोड़कर) कांग्रेस का नेतृत्व नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में ही रहा है। अगर चुनावी नजरिये से देखा जाए, तो पार्टी की चमक और उसका आकर्षण तीन वजहों से तेजी से घट रहा है।
पहला, नेहरू और इंदिरा की करिश्माई शख्सियतों की याद उन युवा मतदाताओं के जेहन में नहीं है, जिनकी संख्या मतदाता सूची में तेजी से बढ़ रही है। दूसरा, इन युवा मतदाताओं को न तो इंदिरा, और न ही राजीव गांधी की बर्बर हत्या की याद है। और तीसरा,एक उत्साही और महत्वाकांक्षी समाज में खुद की श्रेष्ठता साबित करने के लिए अपने किसी पूर्वज की उपलब्धियों का सहारा नहीं लिया जा सकता।
इन संरचनात्मक वजहों के अलावा एक नेता के तौर पर संभावित वारिस राहुल गांधी की कमजोरियां भी है। ऊर्जा और महत्वाकांक्षा से रहित राहुल गांधी अपने परिवार के कदाचित पहले सदस्य हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर के लोग भी समुचित सम्मान नहीं देते। राजनीति में उन्हें आए एक दशक होने को आया, मगर विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान अपने प्रचार अभियानों में वह न तो कैडर और न ही मतदाताओं पर कोई असर डालने में कामयाब हो सके हैं।
इस संदर्भ में भारत के पूरे राजनीतिक इतिहास को चार अलग-अलग चरणों में बांटकर देखा जा सकता है। रजनी कोठारी ने जिस 'कांग्रेस व्यवस्था' की बात की, वह 1989 तक चली। आजादी के बाद पूरे चार दशकों तक कांग्रेस तकरीबन लगातार केंद्र और बहुत से राज्यों में भी सत्ता में रही। 1989 से 1998 का दौर संक्रमण का समय था। इस दौरान देश भर में कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी आई, और राज्यों में क्षेत्रीय, धार्मिक, जाति और समुदाय आधारित राजनीतिक पार्टियों की सरकारें बनने का दौर शुरू हुआ।फिर 1998 से 2014 तक द्विध्रुवीय राजनीति का उदय हुआ। इसकी वजह भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर उभरना था। अब राजनीति के दो ध्रुव हैं, कांग्रेस व भाजपा, और इन्हीं के चारों ओर छोटी पार्टियों ने इकट्ठा होना शुरू किया।
2014 के बाद भारतीय राजनीति का चौथा चरण प्रारंभ हुआ है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी है कि हम एक बार फिर से केंद्र और राज्यों में एक पार्टी के प्रभुत्व के गवाह बनने जा रहे हैं, और इस बार कांग्रेस की जगह भाजपा होगी। मगर कांग्रेस की वर्तमान हालत देखकर यह कयास लगाना बेहद मुश्किल है कि कांग्रेस कैसे जल्द से जल्द अपनी दशा में सुधार ला सकती है। शायद कांग्रेस की कहानी भी इंग्लैंड की लिबरल पार्टी जैसी है, जो कभी ब्रिटिश राजनीति का केंद्र थी, मगर बाद में हाशिये पर आ गई।