राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजीत सिंह ने हालांकि सरकारी कोठी अब छोड़ दी है, पर जब केंद्र सरकार ने उनके बंगले में बिजली-पानी का कनेक्शन काट दिया था, तब उन्हें समर्थन मिला था मुलायम सिंह और नीतीश कुमार जैसे बड़े राजनेताओं का। अजीत सिंह की मांग है कि उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के नाम पर यह कोठी उन्हें दे देनी चाहिए। उनकी इस मांग का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन क्यों न आए ऐसी मांग, जब जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, लाल बहादुर शास्त्री और बाबू जगजीवन राम जैसे राजनेताओं के वारिसों ने स्मारक बनाने के नाम पर दशकों से कब्जा कर रखा है उनकी सरकारी कोठियों पर? यह प्रथा गलत है। वर्ष 2000 में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लुटियंस दिल्ली में जो मुट्ठी भर निजी कोठियां रह गई हैं, उनकी कीमत कम से कम 150 करोड़ प्रति एकड़ है। इनमें रहते हैं देश के सबसे बड़े धनवान।
सवाल है कि जनता के प्रतिनिधियों को धनवानों की तरह रहने का किसने दिया अधिकार? हमने दिया है यह अधिकार। 'हम' में पत्रकार भी कोई कम गुनाहगार नहीं। नेहरू की समाजवादी राजनीतिक परंपराएं जब पूरी तरह से कायम थीं 70-80 के दशकों में, तब हमारे अति चतुर राजनेताओं ने हम जैसे पत्रकारों को सरकारी कोठियां मुहैया कराई थीं। जब पत्रकार बिरादरी को राजनेता इस तरह उपकृत करेंगे, तो पत्रकार उनके खिलाफ भला क्यों मुंह खोलेंगे? यह आदत यदि नरेंद्र मोदी तोड़ने की हिम्मत दिखलाते हैं, तो महानगरों और राज्य की राजधानियों में इतनी सरकारी जमीन उपलब्ध हो जाएगी कि संभव है, हर भारतीय के सिर के ऊपर छत हो अगले दशक के अंत तक। इसका सपना अगर प्रधानमंत्री देख रहे हैं, तो वह इसे सच करने के लिए क्यों नहीं शुरू करते हैं लुटियन की दिल्ली से?
यह अनुमान लगाया जाता है कि अगर हम लुटियन जोन से जन प्रतिनीधियों को निकाल देते हैं और उन बंगलों का व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो 50,000 करोड़ रुपये का लाभ होगा सरकार को। प्रधानमंत्री अगर चाहें, तो वापस तीन मूर्ति हाउस में रिहायश कर सकते हैं इस मकसद से कि वह औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री निवास बन जाएगा भविष्य में। मंत्रियों के लिए कोठियां बन सकती हैं राष्ट्रपति भवन के 600 एकड़ जायदाद पर, और अगर सांसदों को देना है सरकारी आवास, तो उनको क्यों नहीं उन भवनों में कमरे मिल सकते हैं, जो हर राज्य के नाम पर मौजूद हैं लुटियंस दिल्ली में? ऐसा करने से एक फायदा यह भी होगा कि अनेक लोग राजनीति में आना बंद कर देंगे। हकीकत यह है कि जनता की सेवा के नाम पर ये लोग रहना पसंद करते हैं राजा-महराजाओं की तरह।
सो चलिए, यह उम्मीद करें कि प्रधानमंत्री दोनों हाथों से इस मौके को पकड़ कर भारत की राजधानी को एक ऐतिहासिक मोड़ दे दें। इस नेक काम में जनता का पूरा साथ होगा, क्योंकि जनता का जी भर गया है ऐसे नेताओं से, जो उनके नाम पर सेवा करते हैं सिर्फ अपनी। बेघरों के इस देश में राजनीतिज्ञों को क्यों हो सरकारी आवास का अधिकार?