किसके अच्छे दिन आए, यह स्पष्ट नहीं हो सका। लेकिन जिनके अच्छे दिन जाने वाले हैं, उसकी आहट दस्तक दे रही है। पहले उनसे इस्तीफे मांगे गए, जिनकी वजह से सरकार की नैया डूबी। अब बारी है उनकी, जो राजनीति में हाशिये पर जाने के कारण महिमा-मंडित किए गए। डोल रहे हैं उनके सिंहासन। सिचुएशन बड़े बेआबरू होकर गवर्नर हाउस से हम निकले...सरीखी। वर्षों के पॉलिटिकल करियर के बाद मुख्यमंत्री पद पर अचानक ‘झाड़ू’ फिर जाने के बाद भी उनकी शान-शौकत में कमी नहीं आई थी। देश के सबसे सुंदर प्रदेश की वह मालकिन बन चुकी थी। क्या पता था कि यह चांदनी चार दिन की होगी।
इस देश के नेता कभी बूढ़े नहीं होते। उनकी कुंडली में यदि राजयोग है, तो सिर्फ केंचुल बदलना पड़ता है। वह किसी काबिल न हों, तो भी गवर्नर बनाने के काबिल होते हैं। ऐसी मिसाल भारत में ही मिलेगी कि गवर्नर पद से इस्तीफा देने के बाद नेता पिता तो बने ही हैं, उन्होंने शादी भी रचाई। अब नई सरकार को अपनों को खुश रखना है। उनका ‘कल्याण’ करना है। आपका सुख दूसरों का दुख हो, की फरक पैंदा।
मेरे साथी बोले-इस गरीब मुल्क में इन गवर्नरों और उनके किलेनुमा साम्राज्य को मिटा देना चाहिए। पर प्रदेश की सरकारों को शपथ दिलाने के लिए बेचारे राष्ट्रपति कहां मारे-मारे घूमते फिरेंगे। गवर्नर उनका पॉकेट साइज़ एडिशन हैं। जिन बोरियत भरे आयोजन में प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं पहुंच सकता, ऐसे आयोजन, उद्घाटन के लिए गवर्नर का होना जरूरी है। विरोधी दलों को भी अपने पैर पटकने के लिए कोई ठीहा चाहिए। ज्ञापन लेना उनका प्राथमिक काज है। सिर्फ दिल्ली वाले ही क्यों गर्व करें कि उनके पास राष्ट्रपति भवन है। प्रदेश की राजधानी में बसने वाले भी शहर घुमाने पर किलेनुमा हवेली दिखाकर बताते है यह गवर्नर हाउस है।
सत्ताधारी दल मजबूत मशीन होती है। इस मशीन का ‘स्पेयर पार्ट’ गवर्नर हो जाता है। अब उन्हें अपनों को खुश रखना है। कुछ दिन तो उन्हें भी गुजारने दीजिए गवर्नर हाउस में।