हम पत्रकारों ने अपना दायित्व निभाया होता, तो शायद देश के लाखों गरीब बच्चे आज जीवित होते। सच यह है कि हमको देश की बेहाल स्वास्थ्य सेवाएं तभी याद आती हैं, जब गोरखपुर जैसा कोई हादसा होता है। कुछ दिनों के लिए हम भाग-भागकर सरकारी अस्पतालों की गंदगी, लापरवाही और संवेदनहीनता की चर्चा करते हैं। उसके बाद हम लौटकर राजनीतिक गतिविधियों में उलझ जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि राजनीतिक पत्रकारिता का असली मकसद है सरकारों की विफलताओं पर लगातार रोशनी डालना।
भारत वह देश है, जिसमें पांच वर्ष तक पहुंचने से पहले सबसे ज्यादा बच्चे मरते हैं। इनमें से 55 फीसदी उन चार राज्यों में मरते हैं, जिनको बीमारू कहा जाता है-यानी बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश। आज इन चारों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, लेकिन बच्चों का वही हाल है, जो कांग्रेस के दौर में होता था। जब गोरखपुर जैसी कोई घटना घटती है, तो भाजपा के नेताओं की भाषा भी वही होती है, जो कांग्रेस के नेताओं की हुआ करती थी। समाधान भी वही पुराने वाले हैं। सो अब गोरखपुर के उस अस्पताल में बच्चों की हुई मौत की जांच होगी। ऑक्सीजन के अभाव के लिए जिन अधिकारियों को दोषी पाया जाएगा, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के वायदे होंगे। लेकिन वे सुधार नहीं किए जाएंगे, जिनसे भविष्य में बच्चों की जाने बच सकेंगी।
केवल स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने से समाधान नहीं होगा। सुधार सिर्फ बच्चों के पोषण में नहीं, बल्कि उनके अर्धशिक्षित माता-पिता को प्रशिक्षित करने में, गोरखपुर की गंदी गलियों में सफाई लाने में और देहातों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में लाने होंगे। इतने मोर्चों पर सुधार लाना आसान नहीं हैं। सो समिति गठित की जाएगी, जो अपनी जांच पूरी करने में कई वर्ष लगा सकती है। तब तक दुनिया इस घटना को भूल जाएगी।
समस्या यह है कि सुधार जब तक लाए नहीं जाएंगे, तब तक प्रधानमंत्री का न्यू इंडिया का सपना सिर्फ सपना ही रहेगा। प्रधानमंत्री गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। लेकिन इसका लाभ हमें तभी मिलेगा, जब इन युवाओं को हम अच्छी स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं दे सकेंगे। मोदी को विरासत में मिली हैं दुनिया की सबसे रद्दी आम सेवाएं। भारत का इतना बुरा हाल है कि बांग्लादेश और नेपाल जैसे छोटे और अति-गरीब देश हमसे आगे निकल चुके हैं।
कुछ लोगों ने सारा दोष योगी आदित्यनाथ पर डालने की कोशिश की है, क्योंकि वह पिछले बीस वर्षों से गोरखपुर के सांसद रहे हैं। लेकिन ऐसा करना गलत होगा, क्योंकि असली दोष उत्तर प्रदेश के उन पूर्व मुख्यमंत्रियों का है, जिन्होंने दशकों से यहां राज किया है। माना कि अपने सांसद कोष से योगी जी गोरखपुर की गंदी गलियों में थोड़ी सफाई करवा सकते थे, लेकिन इससे ज्यादा करना उनके बस में नहीं था। हां, उनको दोष इस बात का अवश्य दिया जा सकता है कि मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उनकी प्राथमिकताएं लव जेहाद और गोरक्षा रही हैं, अस्पताल और स्कूल नहीं। सो अब जब उनके अपने ही चुनाव क्षेत्र में इतनी बड़ी घटना हुई है, तब क्या आशा की जा सकती है कि उनकी प्राथमिकताओं में परिवर्तन आएगा?
योगी आदित्यनाथ अगर अपने चुनाव क्षेत्र में ही परिवर्तन लाकर दिखाते हैं, तो गोरखपुर बाकी उत्तर प्रदेश के लिए एक उदाहरण बन सकता है। और इससे नेक काम और क्या हो सकता है कि गोरखपुर के गरीब बच्चों के जीवन में आशा का छोटा-सा दीप जला दिया जाए!