कदाचित वीराने में डेरा डालने के कारण फगुनाहट का बोध नहीं हुआ गब्बर को, अन्यथा सांभा से कदापि न पूछता, होली कब है... कब है होली? इसके बरक्स शहर-कस्बे की तस्वीर ही अलग होती है। होली की आगवानी में इधर-उधर का न जाने कितना कबाड़, लावारिस लकड़ियों के टुकड़े, सूखी जड़ें, घिसे टायर, गत्ते और चीथड़ों का पिरामिड सरीखा कोलाज चौराहे-चौराहे सजा दिया जाता है। पूछने की जरूरत ही नहीं होती कि कब है होली।
अपने मॉर्निंग वॉकी-टॉकी सखा से इतना कहना कि इस बार होली पर तो ‘प्रभुता’ का रंग है; दिल्ली वालों के दोनों हाथ में लड्डू हैं, बिफर पड़े अंगारचंद जी। वह बोले, खाते में ‘पंद्रह’ कौड़ी तक नहीं (‘काले’ धन की)। जहां हरी सब्जी, पीली दाल जुटाना मुश्किल है, जिसे पकाने के लिए लाल सिलेंडर के लिए ‘ब्लैक’ में पैसा देना पड़े, तो ऐसे में उमंग नहीं, उमंग की रस्म अदायगी होनी है।
मैंने कहा, पहले तो आप फागुन लगते ही प्लानिंग शुरू करते थे। किसे गले लगाना है, और किस पर गोबर फेंक पूरे साल का गुबार निकालना है। इस बार उदासी क्यों?
उन्होंने कहा, काहे जले पर नमक छिड़क रहे हो बंधु। फागुन अब फागुन कहां रहा। वह ‘मार्च’ हो गया है। टाइम से तो आम तक नहीं 'बौराता'। अलबत्ता ‘आम आदमी’ ट्वंटी फोर बाई सेवन बौराता फिरता है। नियम कानून वाले बाबा, जिन्हें फागुन में देवर हो जाना चाहिए, जेठ (मलानी) नजर आते हैं। जब रंग ही नहीं बरसता, तो (लुप्तप्राय) चुनरी कहां से भीगे?
दुकानें ड्रैगन से लेकर डोरेमॉन मार्का चीनी पिचकारियों से भले ही सज जाएं, झोली आबकारी विभाग की ही भरती है। ‘होली’ में धूम। हमारी मांग चुल्लू भर भांग। दारू(ण) कथा दरकिनार, मेल-मिलाप की आड़ में मानसिक खुंदक निकालते हैं माननीय। उनकी ठिठोली भी मैली नजर आती है। हंसने के बजाय हंसी उड़ाने का रूपक होता है। अब न खेत हंसते हैं, न खपरैल, तो भला कैसे धुले मन का मैल? बात तीखी लगे, तो बुरा न मानिएगा प्लीज। आखिर होली ही तो है।