साधो, इन दिनों हर कोई मुझे नीचा दिखाने पर आमादा है। उस रोज सब्जी मंडी में टमाटर और आलू ने आंखें तरेर कर इस तरह देखा कि एकबारगी मैं कांप गया और हाथ में थमा खाली थैला छूटकर नीचे जा गिरा। कमजोर शरीर का होने के नाते मैं लोगों से जल्दी डर जाता हूं। थोड़ा आगे बढ़ा, तो प्याज मुझे देखते ही अपनी गुंडई पर उतर आया। तोरई को छुआ, तो वह ऊपर से बहुत कठोर लगी। भिंडी लेडीज फिंगर न होकर शेर के पंजे की मानिंद डरावनी लग रही थी। सब्जियां खाने को दौड़ने लगें, तो समझो कि उनके अच्छे दिन आ गए।
अच्छे दिन सबके लिए अलग-अलग तरह के होते हैं। जैसे भाजपाइयों के लिए जो दिन अच्छे हैं, कांग्रेसियों के लिए वे उस तरह नहीं हो सकते। अच्छे दिन आने के बाद भी अरविंद केजरीवाल अपने लिए दुर्दिन ले आए। रामविलास पासवान का चिराग इस समय खूब रोशनी दे रहा है, पर लालू की लालटेन बुझ चुकी है। नीतीश को बुरे दिनों का एहसास सालने लगा है। मुलायम की त्वचा में झुर्रियां पड़ गई हैं। वामपंथी हाशिये से छिटककर सड़क किनारे के गड्ढे में जा गिरे हैं।
प्रगतिशीलता बहुत बुरे वक्त का सामना कर रही है। हिंदी के कवि चिंतित हैं कि गोधरा पर लिखी कविताओं का क्या करें। सांप्रदायकिता-विरोध की तख्तियों को अब बुहार कर घरों के बाहर फेंका जा रहा है। एक जनवादी मुक्तिबोध के स्वर में कहने लगे, अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया? क्या अब कुछ नहीं हो सकता? मैंने कहा, सब कुछ तो ठीक है। पर उत्तर आधुनिकतावादी अब नरेंद्र मोदी का डंका बजाने लगे हैं। समुद्र में बहुत-सी नौकाएं पाल के सहारे ही चलती और अपनी दिशा तय करती हैं। जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजे। आप पीठ का इस्तेमाल बोझा लादने के लिए भी कर सकते हैं और किसी के सामने दुहरे होने के लिए भी। हारे हुए लोग पीठ पर कोड़े और गोलियां खाते हैं। ताकतवर को लोग पीठ पीछे गालियां देते हैं। पर महंगाई डायन तो सीने पर चढ़कर मूंग दलती है। उसे किसी का लिहाज-खौफ नहीं।