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दिन बहुरेंगे रियल एस्टेट के

Mon, 06 Jul 2015 08:23 PM IST
प्रदीप एस मेहता
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शहरी विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों और उपभोक्ता संगठनों, उद्योग संघों, शिक्षाविदों, विशेषज्ञों तथा मीडिया जैसे इसके संबद्ध हितधारकों की सराहना के बावजूद रियल एस्टेट (नियमन और विकास) विधेयक, 2013 को सरकार ने बिल्डरों के दबाव में कमजोर कर दिया था। नतीजतन यह पिछली लोकसभा के आखिरी सत्र में पारित नहीं हो सका और पूरे विपक्ष ने सरकार से यह भरोसा दिलाने को कहा कि इसमें संशोधन किया जाएगा, ताकि उपभोक्ताओं के हितों का पोषण हो सके। यह विधेयक अब राज्यसभा की स्थायी समिति के पास है, जिसने इसके तमाम हितधारकों से सुझाव मांगे हैं।
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रियल एस्टेट विधेयक उस दौर में पेश किया गया था, जब देश में नियामक व्यवस्था अविकसित और बेतरतीब थी। यह राज्य स्तरीय नियामक प्राधिकरणों यानी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (आरईआरए) के गठन की वकालत करता है, ताकि इस क्षेत्र के नियमन के लिए सभी रियल एस्टेट परियोजनाओं और बिचौलियों (जैसे रियल एस्टेट एजेंट) का निबंधन किया जा सके। इस प्रस्तावित एजेंसी से सभी संबंधित व्यक्तियों के हितों का संतुलन करने, रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने तथा प्रतिस्पर्धा बढ़ावा देने की अपेक्षा है।

अपारदर्शी और रियल एस्टेट प्रमोटरों और उनके एजेंटों द्वारा उपभोक्ताओं को लूटे जाने की वजह से रियल एस्टेट क्षेत्र का नियमन आज की बड़ी जरूरत है। नियमों के अभाव में उपभोक्ता बिल्डरों के खिलाफ पूरी जानकारी हासिल करने अथवा उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने में असमर्थ होते हैं। विश्लेषकों का भी मानना है कि बड़े उपभोक्ता वर्ग को प्रभावित करने के कारण शेयर बाजार से ज्यादा जरूरी रियल एस्टेट का प्रभावी नियामक बनाना है।
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रियल एस्टेट विधेयक इन्हीं कमियों को दूर करने की कोशिश है। इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, आरईआरए की वेबसाइट पर सभी परियोजनाओं की जानकारियां अपलोड करनी जरूरी है। इससे पारदर्शिता तो आएगी ही, यह क्षेत्र भी उत्तरोत्तर मजबूत होगा। डेवलपर को भी उम्मीद है कि पारदर्शिता और जवाबदेही तय होने के बाद इस क्षेत्र में घरेलू और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि इस संशोधित विधेयक में भी कुछ कमियां हैं। मसलन, इसमें अभी उन परियोजनाओं को शामिल नहीं किया गया है, जो 1,000 वर्ग मीटर या 12 अपार्टमेंट से कम की हैं। इस प्रावधान का फायदा उठाकर डेवलपर्स 1,000 से अधिक वर्ग मीटर की परियोजनओं को दो-तीन हिस्सों में बांट सकते हैं, और विधेयक के प्रावधानों से बच सकते हैं। इसी तरह, सरकारी एजेंसियों को भी इस विधेयक से बाहर रखा गया है, जिनकी अनुमोदन की धीमी प्रक्रिया कई परियोजनाओं में विलंब का कारण बनती है। न्यायिक निकायों द्वारा इससे जुड़े अपराधों के स्वतः संज्ञान लेने पर रोक लगाने संबंधी प्रावधान भी उपभोक्ता-हितों को कमजोर करते हैं। बहरहाल, उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार सतर्क हितधारकों की तरफ से आए सुझावों पर ध्यान देगी, ताकि रियल एस्टेट उद्योग को फिर से संवारा जा सके, और सरकारी निगरानी के बहुपयोगी उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।
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-लेखक उपभोक्ता से जुड़ी सोसाइटी कट्स के महासचिव हैं
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