तिब्बत की राजधानी ल्हासा के पास दूर-दूर दो आश्रम थे। एक आश्रम का प्रधान लामा बूढ़ा हो रहा था और चाहता था कि प्रमुख आश्रम से किसी को वहां भेजा जाए। उसने संदेश भेजा कि ऐसे संन्यासी को भेजें, जो आश्रम संभाल सके। प्रमुख प्रधान ने जवाब भेजा, मैं सौ संन्यासियों को भेजूंगा। जिसमें एक भी पहुंच जाए, तो तुम्हारी किस्मत है।
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अगले दिन सौ संन्यासी एक नौजवान दूत के साथ प्रमुख आश्रम से रवाना हुए। रास्ते में जिस संन्यासी का घर आया, वह कोई न कोई बहाना बनाकर खिसकने लगा। एक सप्ताह में केवल दस लोग बचे थे। वे एक नगर में प्रविष्ट हुए। वहां कुछ लोग उनके पास आए और बताया कि उनके प्रधान की मृत्यु हो गई है। किसी एक लामा के प्रधान बनने की उन्होंने गुजारिश की। संन्यासियों की टोली में से एक व्यक्ति वहीं रह गया।
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कुछ दूर आगे बढ़ने पर दूसरा नगर आया। वहां राजा के कुछ आदमी आए और बोले, राजकुमारी की शादी है, जिसके लिए तीन पुरोहित चाहिए। इस तरह तीन आदमी और रुक गए। देखते-देखते आखिर में दो व्यक्ति ही बचा। वे आश्रम के पास पहुंचे ही थे कि एक जवान स्त्री मिली। उसने कहा, मेरे पिता अभी तक नहीं लौटे हैं। मैं अकेली हूं, इस कारण भयभीत हूं। यह सुनकर एक संन्यासी वहीं रुक गया।
अब दूत के साथ सिर्फ एक संन्यासी था। मगर आश्रम पहुंचने से पहले एक व्यक्ति ने विवाद के लिए उन्हें चुनौती दी। हालांकि नौजवान दूत ने विवाद से बचने की बात कही, क्योंकि उसके लंबा खिंचने का डर था, पर संन्यासी नहीं माना। अब नौजवान अकेला ही आश्रम की ओर बढ़ा। गुरु जानता था कि शायद ही कोई संन्यासी आश्रम तक पहुंचेगा। इसलिए बूढ़े प्रधान ने उस नौजवान को ही उत्तराधिकारी बना दिया।