कोई हमें बताएगा कि इन विपक्षवालों की प्रॉब्लम क्या है? हर बात में पीएम का नाम घसीट लेते हैं। सिर्फ नाम ही नहीं घसीट लेते, पर्सनल भी हो जाते हैं। उनके घर में ताका-झांकी करने लगते हैं। कभी आडवाणी से उनका नाता तोड़ने लगते हैं, तो कभी अडानी से उनका नाता जोड़ने लगते हैं। अब तो विपक्षवालों ने उनके पहनावे को भी विवाद में घसीट लिया है। और शिकायत क्या है? यह तो सूट-बूट सरकार है। यह किसानों का भला कर ही नहीं सकती है।
वैसे यह बात समझ में नहीं आई कि विपक्षवालों को आखिर आपत्ति किस चीज पर है- सूट पर या बूट पर। सूट पर आपत्ति करने से पहले विपक्षवालों को जनता को यह भी बताना पड़ेगा कि अगर सरकार सूटवाली नहीं रहेगी, तो उससे सरकारी कोष का जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कैसे की जाएगी? पीएम का नाम लिखा सूट छह-छह करोड़ से भी ज्यादा में नीलाम हुआ है! है कोई ऐसी ड्रेस, जो सरकार की इस तरह की कमाई करा सके?
रही बात बूट की, तो बूट अब शहरी लोगों की भी बपौती नहीं रह गया है। मेहनत-मजदूरी करने वालों का बूटीकरण भले न हुआ हो, बूट का सर्वहाराकरण जरूर हो गया है। सरकार के सूट-बूट पर ताना मारने वाले यह भूल जाते हैं कि अब हरेक पेट को रोटी हो न हो, हरेक पांव को किसी न किसी तरह के बूट जरूर नसीब हैं। विपक्षवाले क्या चाहते हैं कि पब्लिक बूट पहनकर चहलकदमी कर रही हो, तब भी सरकार को नंगे पांव ही रहना चाहिए!
फिर सरकार के सूट-बूट पर छींटाकशी करने वाले आखिरकार कैसा देश बनाना चाहते हैं? कोपीनधारी या गांधी की तरह अधनंगे फकीरों का देश। साठ साल तक इस देश में अधनंगों का महिमामंडन ही तो हुआ है। पर अब और नहीं। अब गरीबी का नहीं, अमीरी का महिमामंडन होगा। धोती-कुर्ता की आकांक्षा करने वालों से आठ-दस फीसदी की रफ्तार से विकास की उम्मीद नहीं की जा सकती है। जब देश को सूट-बूट के सपने आएंगे, तभी तो दुनिया भर में हमारी तरक्की के झंडे गाड़े जाएंगे।