भिक्षा लेकर गुरुकुल लौटते हुए एक विद्यार्थी ने मुर्गे और कबूतर की बातचीत सुनी। कबूतर कह रहा था, मेरा भी क्या भाग्य है? भोजन नहीं मिले, तो मैं कंकड़ खाकर भी पेट भर लेता हूं। कहीं भी रह लेता हूं। मगर जिसे देखो, वही मुझे मारकर खाने पर तुला रहता है। आकाश में मैं रह सकता, तो पृथ्वी पर कभी आता ही नहीं।
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मुर्गे ने कहा, मेरा भी यही हाल है। गंदगी में से दाने चुन-चुनकर खा लेता हूं। लोगों को जगाने के लिए रोज सुबह बांग देता हूं। मगर जिसे देखो, वही हमें कैद कर लेता है। हलाल तक कर देता है। ईश्वर ने मुझे पंख तो दिए, पर उनमें इतनी शक्ति दी होती कि आकाश में उड़ पाता, तो मैं भी पृथ्वी पर नहीं आता।
विद्यार्थी ने सोचा कि अवश्य ही ईश्वर ने इनके साथ अन्याय किया है। आश्रम पहुंचकर उसने अपने गुरु से इस बारे में चर्चा की। ॠषि बोले, ईश्वर ने मनुष्य के साथ अन्य प्राणियों को भी खूबी और खामियां देकर पृथ्वी पर भेजा है। मुर्गे और कबूतर में जो विलक्षणता ईश्वर ने दी है, वह किसी प्राणी में नहीं है।
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मुर्गे के सिर पर ईश्वर ने राजमुकुट की तरह कलगी दी है। इसीलिए उसे ताम्रचूड़ कहते हैं। ईश्वर ने उसे पंख दिए हैं, मगर वह पृथ्वी पर रहना ही पसंद करता है। वह आलसी हो गया है। भोजन के लिए उसने गंदगी ही चुनी। ईश्वर ने उसके साथ कोई अन्याय नहीं किया है।
ऋषि आगे बोले, रही बात कबूतर की, तो ईश्वर ने पक्षियों के लिए खुला आकाश दिया, फिर भी वह पृथ्वी के आकर्षण से बंधा यहीं विचरण करता है। कबूतर ही है, जिसमें बहुत ऊंचा और दूर तक उड़ने की सामर्थ्य है, मगर वह परिश्रम से बचता है। कबूतर के पास पंख हैं, फिर भी वह उड़कर अपनी रक्षा नहीं कर सके, तो यह उसका दोष है, ईश्वर का नहीं।