जिस किसी ने भी रजाई की उत्पत्ति की सोची थी, वह मेरी नजर में अत्यंत महान व्यक्ति है। शीतकाल में ग्रीष्म ऋतु का आभास कराने वाली रजाई इस समय मेरा प्रिय परिधान है। हालांकि मैं इसे ओढ़कर कहीं जा नहीं पाया, लेकिन कई बार इच्छा होती है कि इसकी सुविधा बस में यात्रा करते समय अथवा दफ्तर में काम करते हुए भी मिले, तो कितना अच्छा हो।
रजाई सस्ती और टिकाऊ तो है, पर इसे सुंदर मैं इसलिए नहीं कहूंगा, क्योंकि इसे सड़क पर ओढ़कर जाने की मान्यता अभी नहीं मिली है। मेरी राय में रजाई धारक संघ का गठन कर इसके उपभोक्ताओं को इसकी मान्यता के लिए संघर्ष समिति गठित कर समाज से इसका खोया हुआ मान प्राप्त कर लेना चाहिए। कभी मौका मिला, तो मैं ही रजाई ओढ़कर सड़क पर निकल पड़ूंगा।
एक समय हमारे पास एक अदद रजाई थी और मैं, पत्नी एवं तीन बच्चों सहित पांच लोग इसकी खींचतान में लगे रहते थे। तब घर में रजाई की संख्या चाहते हुए भी नहीं बढ़ रही थी। वर्षों तक एक ही रजाई के इस्तेमाल से वह जर्जर हो चुकी थी। बच्चे उसकी फटी हुई रूई से बाहर की दुनिया से तादात्म्य बनाए रहते थे। सिरों की तैलीय चिकनाई से रजाई बदरंग हो चुकी थी, लेकिन उसे ओढ़ने के सिवा विकल्प नहीं था, क्योंकि जब तापमान निरंतर नीचे चला जाता था, तब वह हम सबकी रक्षा करती थी।
एक सुबह हमने उसे धूप में डाला, तो आसपास की छतों से लोग उस एंटिक पीस को देखने उमड़ पड़े। पड़ोसियों को लगा कि मैंने मोहल्ले का अपमान कर दिया है। होनी को कौन टाल सकता है! ऊपर बंदर आ गए और वे रजाई से खेलने लगे। शाम को छत पर देखा, तो रजाई अपना अस्तित्व खो चुकी थी। मेरी आत्मा चीत्कार कर उठी। पत्नी की रूह कांप गई तथा बच्चों के कलेजे मुंह को आ गए।
हम ठंड से निपटने के उपाय के बारे में सोच ही रहे थे कि मोहल्ले के खिलाड़ीरामजी आए और एक नई रजाई पेश करते हुए बोले, इसे स्वीकार कर पूरे मोहल्ले को राहत प्रदान कीजिए। मुझे काटो, तो खून नहीं। मैंने उनसे कहा, आप जले पर नमक लगाने आए हैं? मेरी रजाई आप लोगों के कारण तबाह हो गई। वह बोले, ऐसा मत सोचिए। ठंड का मौसम है। इसमें रजाई का अपना महत्व है। मुझे लगा, खिलाड़ीराम सही फरमा रहे हैं। रजाई में रेगिस्तान की गर्मी और सहारा की उष्णता है। आत्मसम्मान के लिए इसे त्यागना बुद्धिमानी नहीं।