देश का एक राज्य, जिसके शासक अपनी विफलताओं का ठीकरा आसानी से केंद्र पर फोड़ते रहे, उन पांच राज्यों में शामिल है, जहां चुनावी माहौल गरम है। मौसम बेतुके बोलों का, आरोप-प्रत्यारोप का। सरल शब्दों में तू-तू, मैं-मैं का सजीव प्रसारण।
पांच साल बाद दूर से दर्शन देने वाले ‘प्रभु’ साक्षात दर्शन देंगे। इस विलंबित शुभागमन पर कैसी शिकायत! जनता नादान थी। पिछले चुनाव में विजयोपरांत उनकी तर्जनी और मध्यमा का हवा में लहराता चिह्न विजय का प्रतीक न होकर रोमन लिपि के पांच का सूचक था कि भइये अब हम पांच वर्ष बाद ही दिखेंगे। वे फिर ‘मत’ की शक्ति अर्जित करने निकल पड़े हैं।
अजब संयोग है, असली जंग सिर्फ दो विभूतियों के बीच। विद्वता और विद्रोह की प्रतीक एक की दाढ़ी काली और दूसरे की झक सफेद। दोनों बाण चलाए जा रहे हैं शब्दों के। एक का गोधरा कांड का पारण कर वोटरों को ‘सेंटी’ करने का प्रयास, तो दूसरा, साठ वर्ष के कुशासन की दुहाई देकर आगामी साठ महीने के विकास-पैकेज का अभिलाषी। वोट के लिए भटकती आत्माएं अपना-अपना खोमचा उठा अंतरात्मा की आवाज पर जनता की सेवा के लिए निकल पड़ी हैं। लेकिन बुनियादी बातें नाम-मात्र की। महंगाई, भ्रष्टाचार साइलेंट-मोड पर।
अपने-अपने क्षेत्रों में फिर लौट के आ रहे हैं वे। चुनाव पूर्व भले ही किसी के दुआरे मातमपुर्सी करने न गए हों, फिलवक्त क्षेत्र के बीमार वोटर की कुटिया में ‘विनीत’-मुद्रा में प्रविष्ट इलाज के लिए तहकीकात करेंगे। प्रगट में दवा, नेपथ्य में चमचों द्वारा दारु का भी इंतजाम। अंदर का भेड़िया कुछ समय के लिए सुषुप्तावस्था में।
वे जानते हैं कि उनके ‘रियल’ मतदाता उतने ही मूर्ख हैं, जितने पहले थे। याद्दाश्त पर सम्मोहिनी डाल वे फिर लूट लेंगे कीमती वोट। उन्हें पता है कि उनका कटोरा कौन भरेगा। जिन्हें अंगुली में दाग लगवाना पसंद नहीं, नफासत वाले वे लोग घर बैठ ‘एक्जिट-पोल’ देखते रह जाएंगे।
वे दिन में प्रचार करेंगे, रात में भी घूमेंगे। रात-दिन एक कर देंगे अपना ‘भविष्य’ बनाने के लिए। घोषणा-पत्रों की लाल-नीली-पीली-तिरंगी पतंग चुनावी आकाश पर लहराने लगी हैं। पेच लड़ाने को सभी तैयार। बहरहाल, मतदाताओं के ‘राशिफल’ में लिखा है कि आने वाले कुछ दिन अच्छे बीतेंगे। दिसंबर के बाद फिर मुसीबत में फंसना ही नियति है।