अगले महीने जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उन्होंने हमारा ध्यान देश के सामने खड़ी जटिल चुनौतियों से भटकाने का काम किया है। विश्लेषक यही गुत्थी सुलझाने में व्यस्त हैं कि इन सूबों में हार-जीत का कांग्रेस और भाजपा पर क्या असर पड़ेगा?
2014 के लोकसभा के चुनाव से जुड़ी तमाम भविष्यवाणियां इस अटकलबाजी के साथ जुड़ी हैं। एक ओर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी अपने चुनाव अभियान का संचालन युद्धस्तर पर कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ ‘युवराज’ राहुल हैं, जिनका अभिषेक कांग्रेसी कब का संपन्न कर चुके हैं। इन दो पहलवानों की कुश्ती के तमाशबीन बहुतेरे हैं और अपने चहेते की हौसला अफजाई के उनके शोरगुल में चुनावी मुद्दे जाने कहां गुम हो गए हैं।
ये विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं, मगर ‘राहुल बनाम मोदी’ वाले दंगल के कारण नहीं। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली चार ऐसे राज्य हैं, जो हिंदी पट्टी का हिस्सा हैं। दिल्ली को इस सूची में देख चौंकिए नहीं, आज देश की राजधानी पंजाबी शरणार्थी बहुल या ‘पुराने शहर’ के बाशिंदों की नगरी नहीं।
पुरबिए 'भैया' और पहाड़ी अप्रवासियों के अलावा देश भर से बिन बुलाए आगंतुक मेहमान मजदूरों-कारीगरों- बेरोजगार नागरिकों ने इसका चेहरा बदल डाला है। दिल्ली की सरहद उत्तर प्रदेश, हरियाणा को छूती है तथा राजस्थान से दूर नहीं। इन राज्यों की राजनीति से आज दिल्ली के चुनाव अप्रभावित नहीं रह सकते।
राजनीति के पंडित अकसर यह ज्ञानदान करते रहते हैं कि भारत की राजनीति में जाति सबसे असरदार है और इसके बाद नंबर आता है धर्म का। मतदान के वक्त जाति और धर्म का समीकरण या निर्वाचन क्षेत्र विशेष में अंतरविरोध ही किसी प्रत्याशी या दल की हार जीत तय करता है। हमें लगता है कि इस स्थापना पर पुनर्विचार का समय आ चुका है।
अस्मिता की राजनीति को बढ़ावा देने के खतरनाक काम में खुद को धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील बतलाने वाले राजनीतिक दलों की भूमिका तथाकथित सांप्रदायिक-फासीवादी दलों से रत्ती भर कम नहीं रही है। अल्पसंख्यक तुष्टीकरण को बहुसंख्यक तबके की हिंसक आक्रामक कट्टरपंथ से कम जानलेवा जोखिम नहीं माना जा सकता।
जहां तक सांप्रदायिक दंगों के विस्फोट का प्रश्न है, कांग्रेस शासित राजस्थान और उत्तराखंड या सपा शासित उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड भाजपा के राज वाले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से बदतर ही रहा है। ऐसी हालत में गोधरा युग में गुजरात के दंगों का बारंबार जिक्र यह शक पैदा करता है कि विकास के क्षेत्र में जटिल चुनौतियों का सामना करने में शर्मनाक असफलता के कारण ही सत्तारूढ़ कांग्रेस इस मुद्दे को उछालती है।
जो बात अनदेखी नहीं की जा सकती, वह यह है कि इन चुनावों में भ्रष्टाचार के आरोपों को दरकिनार करना कठिन होता जा रहा है। इसकी सबसे बेहतरीन मिसाल दिल्ली है। शीला दीक्षित यह मान कर चल रही थीं कि आंतरिक कलह से ग्रस्त भाजपा को हरा चौथी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज कराना आसान होगा। वह अपनी सरकार के काम को ही अपना सबसे बड़ा बल मानती हैं। दुर्भाग्य से उनके कार्यकाल में उन्हीं की पार्टी के सुरेश कलमाड़ी सरीखे आलाकमान के मुंह लगे नेताओं की करतूतों का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े जिन घोटालों से यूपीए के दामन में दाग लगने शुरू हुए थे, उनकी परिणति कोलगेट में भी नहीं हुई। आज यह दलील काफी नहीं कि दिल्ली राज्य सरकार का कोई लेना-देना इन सौदों से नहीं या फिर यह रक्षात्मक तर्क कि अपने नागरिकों की जान और माल की हिफाजत करने में बेचारी मुख्यमंत्री असमर्थ हैं, क्योंकि पुलिस का नियंत्रण उनके हाथ नहीं।
अगर अरविंद केजरीवाल इतनी तेजी से मसीहाई तेवर अपनाकर कद्दावर जनहितकारी नेता के रूप मे उभर सके हैं, तो इसका कारण भाजपा तथा कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय दलों से आम आदमी का मोह भंग है। जो बात निर्विवाद है वह यह कि एक-दो सीट जीत कर भी आम आदमी पार्टी दिल्ली विधान सभा को त्रिशंकुवत कर सकती है।
छत्तीसगढ़ में बर्बर नक्सली हिंसा ने कांग्रेस के महत्वाकांक्षी चुनाव अभियान को पटरी से उतार दिया। इस प्रकरण ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए, जो आज तक निरुत्तरित हैं। कोलगेट घोटाले में ही यह बात भी सामने आई कि भ्रष्टाचार के आरोपों में, उद्योगपतियों के साथ सांठगांठ के आक्षेपों से भाजपा या अन्य गैरकांग्रेसी सरकारें भी मुक्त नहीं।
दिल्ली में शीला दीक्षित की ही तरह राजस्थान में अशोक गहलोत भी अपने दल के आलाकमान का बोझ ढोते निरीह निहत्थे दिखलाई देते हैं। कभी अपने सामंती संस्कार के कारण पराई समझी जाने वाली वसुंधरा राजे एक बार फिर विकल्प के रूप में देखी जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लड़ाई कांटे की आंकी जा रही है, पर मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की सरकार को बदनाम करने की कोशिशें नाकाम ही साबित होती रही हैं। चाहे व्यभिचारी बुजुर्ग मंत्री के कुकृत्यों के आरोप हों या भगवा ध्वजधारी गैर सरकारी संगठनों की तरफदारी अथवा आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन करने वाले मंत्री की नादानी, स्वयं मुख्यमंत्री बेदाग रह सके हैं। सांप्रदायिकता या फासीवाद का कलंक उन पर नहीं लगाया जा सका है।
इस पूरे परिदृश्य में यह बात हमें यह सोचने और कहने को बाध्य करती है कि सुशासन को मतदाता अपनी समझ और सरोकारों के अनुसार परिभाषित करता है। पुरखों के पुण्य का बखान, या सुनहरे भविष्य के लोकलुभावन वायदे अब किसी मतदाता को झांसा नहीं दे सकते- न अल्पसंख्यक को, न पिछड़े को, न ही बहुसंख्यक वंचित या दलित को!