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उन्हें हथियार नहीं, सम्मान चाहिए

Sat, 25 Jan 2014 01:56 AM IST
मनीषा सिंह
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अब जल्दी ही ऐसा हल्का रिवॉल्वर बाजार में आने वाला है, जो स्त्रियों को आत्मरक्षा में मदद दे सकेगा। 'निर्भीक' नाम के इस रिवॉल्वर के बारे में दावा है कि यह 16 दिसंबर जैसी घटनाओं की रोकथाम में मददगार साबित होगा। आत्मरक्षा के लिए ऐसे ठोस हथियार के अलावा काली मिर्च के स्प्रे, तगड़ा करंट मारने वाले गैजेट, खास तरह की अलर्ट करने वाली सीटी और महिलाओं को अपराधियों से बचाने या किसी आपात स्थिति में उनकी मदद के लिए किसी को पुकारने के संबंध में तरह-तरह के औजारों के बारे में लगातार कहा-सुना जा रहा है। इस नेकनीयती पर संदेह नहीं है। क्या ऐसे हथियारों से महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कोई कमी आएगी?
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अक्सर कहा जाता रहा है कि अगर महिलाएं बड़ी संख्या में घर से बाहर निकलेंगी, तो उनके साथ होने वाले हादसे कम होंगे। पर घटनाएं बताती हैं कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के बावजूद उनके खिलाफ होने वाले हादसों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में, यह सोचने की जरूरत है कि कहीं असली समस्या हमारी सामाजिक संरचना की तो नहीं है, जो आधुनिकीकरण की आंधी में तबाह होकर रह गई है।

किसी भी सरकार के लिए घर से बाहर निकलने वाली हर स्त्री की सुरक्षा का प्रबंध करना बहुत मुश्किल काम है। तेजाब की बिक्री प्रतिबंधित करने से लेकर यौन प्रताड़ना कानूनों में इस बीच कई सुधार किए गए हैं। पर महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति को लेकर समाज के सहज और संवेदनशील होने और उन्हें उनकी काबिलियत के लिए आदर-सम्मान देने की बात शायद ही कहीं कही जा रही है।
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आंकड़े बताते हैं कि जागरूकता के तमाम प्रयासों के बाद भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की दर बढ़ी है। मुंबई के एक एनजीओ, प्रजा फाउंडेशन, ने सूचना के अधिकार के तहत जो आंकड़े निकलवाए, उनके अनुसार 2011-12 में वहां बलात्कार की 187 घटनाएं हुईं, जो 2012-13 में बढ़कर 294 हो गईं। इसी अवधि में छेड़छाड़ की घटनाएं 554 से बढ़कर 793 तक पहुंच गईं।

कड़े कानूनी प्रावधानों के बावजूद कई पेच ऐसे हैं, जो अपराधियों को अभयदान देते हैं। जैसे, नाबालिग अपराधी का कृत्य चाहे कितना ही दुर्लभतम श्रेणी का हो, कानून उसे बालिग अपराधी के समान दंडित नहीं कर सकता। उधर, गांव-कस्बों में महिलाएं कतई सुरक्षित नहीं हैं, वहां का जड़ समाज अब भी महिलाओं को अपने पांव की जूती से ज्यादा अहमियत नहीं देता। पर शहरों के पढ़े-लिखे समाज के बीच हालात तो और भी बदतर हो रहे हैं।

एक छोर पर सरकार और कानून है, जहां महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने की कोशिशें हो रही हैं, दूसरे छोर पर वही मर्दवादी और पितृसत्तात्मक समाज है, जो पहले तो स्त्री को गर्भ में कुचलने का प्रयास करता है, उसके बाद भी अगर वह संघर्ष करके घर से बाहर की दुनिया में पुरुषों की बराबरी की कोशिश करे, तो वहां छेड़छाड़, तेजाब और बलात्कार जैसे दंश देकर उसे अपनी औकात में रहने को कहा जाता है। स्त्रियों के खिलाफ बढ़ते अपराध हमारे युवा समाज की विकृत सोच के परिचायक भी हैं। देश में होने वाले 65 फीसदी गंभीर अपराधों से 16 से 30 साल के आयु वर्ग के युवाओं का शामिल होना इसकी तस्दीक करता है। ज्यादातर हादसों के पीछे खाया-पीया युवा वर्ग है। शिक्षा के बढ़ते स्तर के साथ-साथ कानूनों में तब्दीली के बावजूद इस मानसिकता में कोई खास सुधार नहीं आ रहा है।

इन स्थितियों में अगर कोई महिला रिवॉल्वर रखने में सफल हो जाती है, तो भी उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। रिवॉल्वर साथ रखकर भी वह बुरी नीयत वाले उन लोगों से खुद को सुरक्षित कैसे रखेगी, जो उसे दिन-दहाड़े अपने ही घर में, कार्यस्थल पर और ट्रेन-बस में आते-जाते मिल सकते हैं। सवाल यह है कि क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ एक महिला की है कि वह खुद को बदनीयत से भरे लोगों से बचने का प्रबंध करे। क्या हमारे समाज का इससे सरोकार नहीं है? यदि रिवॉल्वर रखने या मार्शल आर्ट सीखने से स्त्रियों की हिफाजत मुमकिन होती, तो लेफ्टिनेंट सुष्मिता चक्रवर्ती जैसी महिलाओं को आत्महत्या करने की जरूरत नहीं पड़ती।
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