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बच्चों को खुला आकाश दीजिए

Tue, 19 Sep 2017 06:10 PM IST
सुभाष गाताडे
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सुभाष गाताडे
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एनसीईआरटी ने केंद्र और राज्य के स्कूलों को सुझाया है कि वह बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार रोकने के लिए पाठ्यपुस्तकों में चित्रों एवं संक्षिप्त जानकारी के माध्यम से उन्हें सचेत करने का काम करें। बाल एवं महिला विकास मंत्रालय ने इस सिलसिले में उससे संपर्क किया था और जिसे एनसीईआरटी ने स्वीकार किया। इसी के तहत अगले सत्र से एनसीईआरटी की हर किताब पर आसान भाषा में दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, जो किताबों के अंदरूनी कवर पर मुद्रित होंगे। बच्चों को 'अच्छा स्पर्श' एवं 'बुरा स्पर्श' के बारे में भी उसमें बताया जाएगा।
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यह अच्छी बात है कि बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाओं को रोकने, जागरूकता फैलाने के लिए लोग, नागरिक समाज एवं सरकारें भी सचेत हो रही हैं। मिसाल के तौर पर, सितंबर माह की शुरुआत में ही गुरुग्राम की 12 वर्षीय अनामिका (बदला हुआ नाम) की खबर प्रकाशित हुई थी कि किस तरह वह सात साल तक अपने ही पिता के यौन अत्याचार का शिकार होती रही। इस ज्यादती का एहसास उसे तब हुआ, जब उसे ‘अच्छा स्पर्श’, 'बुरा स्पर्श’ आदि के बारे में स्कूल में बताया गया। उत्तर प्रदेश के कन्नौज के रहने वाले उसके पिता को ‘पोक्सो अधिनियम की धारा 4’ तथा भारत की दंड विधान की धारा 376 एवं 506 के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

पिछले साल दिल्ली सरकार ने बाल यौन अत्याचार को लेकर जागरूकता पैदा करने के लिए हिंदी पोस्टरों की एक शृंखला जारी की थी, जबकि उन्हीं दिनों राष्ट्रीय राजधानी में ऐसे अत्याचारों में तेजी दिखाई दे रही थी। महिला एवं बाल कल्याण विभाग द्वारा जारी इन पोस्टरों में ‘अच्छा स्पर्श','बुरा स्पर्श’ आदि को रेखांकित किया गया था और बच्चों को यह समझाने की कोशिश की गई थी कि वे स्वयं को अनुचित व्यवहार से कैसे बचाएं और खतरे की स्थिति में किससे संपर्क करें। ‘स्वयं को सुरक्षित रखने के चतुर उपाय’, ‘तुम्हें हर समय सुरक्षित रहने का अधिकार है’, आदि शीर्षकों से बने ये पोस्टर सरल भाषा में बच्चों को सचेत करते दिख रहे थे।
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इसमें कोई दोराय नहीं कि यह योजना बाल अधिकारों के लिए कार्यरत विशेषज्ञों की सलाहों के अनुरूप ही है। मगर ऐसे सुझावों की बहुत सीमित उपयोगिता है। ऐसे कदम समाज की उस विफलता पर परदा डाल देते हैं, जो बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के विचार और जमीनी यथार्थ के अंतराल को सामने लाती है। न विशेष अदालतें मौजूद हैं, न बच्चों की काउंसलिंग का इंतजाम है, न सुरक्षित वातावरण जिसमें वे पल-बढ़ सकें। दूसरी ओर समाज की तरफ से इंतजाम मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर पिछले साल जहां एक तरफ पोस्टरों के जरिये जागरूकता फैलाने की बात हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ यह सच्चाई भी सामने आ रही थी कि खुद राजधानी में पोक्सो ऐक्ट के तहत गठित विशेष अदालत को समाप्त किए जाने को लेकर समाजसेवियों को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा था। तब अदालत को पूछना पड़ा था कि प्रशासन ने विशेष अदालत को क्यों समाप्त किया। सूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में इसका भी खुलासा हुआ कि ऐसी अदालतों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन/ नशीली दवाओं/ सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम के तहत आने वाले मामलों का भी बोझ डाला गया था। अच्छे-बुरे स्पर्श के बारे में बताने को महज शुरुआत कहा जा सकता है। दरअसल यह बात इससे जुड़ती है कि सेक्स एजुकेशन को स्कूली पाठयक्रम में शामिल किया जाए, जिसके बारे में मौजूदा सरकार की राय बिल्कुल अलग दिखती है।
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