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धार्मिक डेरे और सियासी बिसात

Tue, 19 Sep 2017 10:07 AM IST
वरुण गांधी
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राम रहिम के शिष्य
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पुराने समय में डेरा का मतलब होता था, ऐसी जगह जहां लोग रहते हैं। बाद में इसका मतलब ऐसी जगह से हो गया, जहां आध्यात्मिक लोग (सूफी भी) इकट्ठा होते हैं। ऐसे डेरे घास-फूस से बनी झोपड़ी या चारदीवारी के साथ छप्पर वाले ठिकाने होते थे। कई तो मंदिर और गुरुद्वारे का मिला-जुला रूप होते थे। पर आज बहुत से डेरों में आलीशान महल और वातानुकूलित कक्ष भी मिल जाएंगे।
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पश्चिम में ऐसी संस्थाओं को आमतौर पर पंथ (कल्ट) कहा जाता है। पंथ एक ऐसे सामाजिक समूह को कहते हैं, जिसमें किसी शख्स या मकसद के प्रति सामान्य हित और कई बार अतिरेक से भरे समर्पण के साथ एक धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक आस्था पद्धति का पालन किया जाता है।

पंथ कई आकार-प्रकार के होते हैं। कुछ अपनी बनावट में ही विध्वंसकारी होते हैं। अनुयायियों पर अपने प्रभाव के कारण हासिल ताकत के चलते चमत्कारी गुरुओं के अपने अनुयायियों का ही शोषक बन जाने की पूरी आशंका होती है। यह शोषण शारीरिक, मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाने वाला होता है और कई बार इसमें यौन शोषण भी शामिल हो सकता है। समाजविज्ञानी एफ. कास्लो, मार्विन बी. एस अपनी पुस्तक कल्ट्स ऐंड फैमिली में बताते हैं कि इन पंथों में शामिल होने वालों के व्यवहार और व्यक्तित्व में दूरगामी बदलाव आ जाते हैं। पंथ के सदस्य सामान्यतः खुद की पहचान खो देते हैं, और समाज व परिवार से दूर होते जाते हैं।
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भारत में हाल के वर्षों में नए जमाने के गुरु और पंथ खूब फले-फूले हैं। इन पंथों में गुरु की व्यक्तिगत शिक्षाओं के साथ योग, ध्यान और जनकल्याण की बातों का समावेश कर प्राचीन ग्रंथों की शिक्षाओं की सरल व्याख्या के साथ विभिन्न वर्गों के लोगों की आध्यात्मिक भूख शांत करने का दावा किया जाता है। इनमें से कुछ समाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने के लिए स्वस्थ और प्रभावी तरीके अपनाते हैं, जबकि अन्य गुरु की महत्वाकांक्षा पूरा करने का माध्यम बनकर रह जाते हैं। राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर रोनकी राम ने वर्ष 2016 में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि उत्तर पश्चिम भारत-खासकर पंजाब और हरियाणा- में करीब नौ हजार डेरे हैं। इनमें से कुछ डेरों के परिसर की फौज जैसी किलेबंदी की जा चुकी है। ये डेरे पिछड़े वर्गों के लोगों को पहचान पाने का मौका देते हैं।

यह विडंबना है कि सामाजिक सुधार आंदोलनों के लंबे इतिहास के बाद भी भारत में एक शख्स पर केंद्रित आंदोलन और पंथों की भरमार है। राजा राममोहन राय द्वारा शुरू किए गए बंगाल पुनर्जागरण ने विभिन्न धर्म व समाज सुधारकों, पत्रकारों, वैज्ञानिकों और लेखकों की मदद से बंगाल की सोच बदली। लगभग उसी समय नास्तिकता और तर्कशीलता की वकालत करने वाला यंग बंगाल आंदोलन भी उच्च वर्ग के शिक्षित हिंदुओं के लिए सामाजिक व्यवहार तय कर रहा था। ऐसे सुधारों के बावजूद ये आंदोलन देश के दूर-दराज इलाकों में जड़ें जमाने में नाकाम रहे। आम आबादी, खासकर पूर्व में संपन्न रहे खेती पर निर्भर पंजाब जैसे अल्प-रोजगार वाले इलाकों में लोग फटाफट आध्यात्मिक शांति तलाशते हैं। इन्हें लंबी प्रक्रिया से आत्मज्ञान प्राप्ति की जगह वरदान से सारी समस्याएं हल कर लेने की चाह होती है।

यह प्रवृत्ति सर्वव्यापी है। हमने केरल के पलक्कड से लेकर उत्तरी कर्नाटक में भी नए पंथ बनते देखे। इनकी तुलना में लंबे समय से सूखा झेल रहे बुंदेलखंड जैसे इलाकों में खुद को जिंदा रख पाना ही अब भी सबसे बड़ा सवाल है। तर्कशीलता का युग, जिसके बारे में हम सोचते थे कि खुद-ब-खुद आ जाएगा, अब भी बहुत दूर है। खासकर पंजाब (जहां 34 फीसदी दलित आबादी है) में समाज सुधार आंदोलनों की विफलता से निराश समाज के निचले पायदान पर मौजूद सामाजिक समूह सामाजिक भागीदारी पाने के लिए डेरों की शरण में पहुंचे, जहां उनके साथ कोई भेदभाव नहीं है और उनकी खुद की पहचान है।

गांधी और अंबेडकर की दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने की कोशिशों के उलट पिछड़े वर्गों के डेरा अनुयायी खुद अपना मंदिर बना रहे हैं। लगातार सामाजिक अलगाव और तिरस्कार झेलते हुए इन समुदायों ने नई पहचान हासिल करने को यह रास्ता अपनाया। ये पंथ किसी खास जाति या क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं, जिसके बल पर इन्हें राजनीतिक और सामाजिक शक्ति मिलती है।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक के. पारगामेंट बताते हैं कि, मुख्यधारा के धर्म और सामाजिक आंदोलनों में जगह बना पाने में विफल रहने के बाद अनुयायियों की एक वैकल्पिक संसार की तलाश इन पंथों और आंदोलनों को खाद-पानी मुहैया कराती है। पंथ और आंदोलन की निहित शक्ति से प्रभावित होकर राजनेताओं ने धार्मिक विचारों वाले लोगों के पक्ष में नीतियां बनाकर उनको बढ़ावा दिया। आखिरकार एक धार्मिक समूह के वोट बैंक को लुभाने से आसान जीत जो मिल सकती है। भारत में सरकारें हमेशा नए आंदोलनों के उभरने में सहभागी रही हैं, जिसके पीछे उनका एकमुश्त वोट हासिल करने का लालच रहा है।

इसके साथ ही धर्मगुरुओं के नेतृत्व वाले पंथों और आंदोलनों का सहारा लेकर शक्तिशाली राजनेताओं के उभरने की प्रवृत्ति भी देखी जा रही है। इन दोनों का भाईचारा सामाजिक बुराई को छिपाने का आवरण प्रदान करता है। पंथ का यह सहयोग राजनेता द्वारा सस्ते वोट हासिल करने की आरामतलब राजनीति का नतीजा है। मूल रूप से डेरा, और ऐसे अन्य पंथ व आंदोलन, समाज के विकास-क्रम का आईना हैं। इनका समाज से एकीकरण एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है।

इस सबके बीच यह देखना बाकी है कि गहरी आस्था की मौजूदगी में क्या देश में कानून और व्यवस्था बनी रहती है? ऐसे धार्मिक समूहों के साथ राजनीति के घालमेल से पैदा हुई सामाजिक हलचल से कई बार सामाजिक लामबंदी और धार्मिक प्रतिस्पर्धा पैदा होती है। समाज के मौलिक स्वरूप को बचाए रखने के लिए, हमें सामाजिक जीवन में तर्कशीलता को फिर से जगह देनी होगी।
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