भारतीय हॉकी के लिए लंबे समय बाद मिली खुशी की तरफ सभी का ध्यान गया है। जूनियर वीमैन्स हॉकी वर्ल्ड कप में लड़कियों ने पहला कांस्य पदक जीतकर जो इतिहास रचा है, वह काबिलेतारीफ है। जर्मनी में आयोजित इस टूर्नामेंट में इंग्लैंड की टीम को हराकर भारत यह पदक जीतने में सफल रहा। लेकिन दुखद है कि भारत की ही लड़कियों द्वारा स्पेन के गास्टिज में आयोजित फुटबॉल टूर्नामेंट में हासिल एक अन्य ट्रॉफी की तरफ कम लोगों का ध्यान गया है।
झारखंड की राजधानी रांची के पास स्थित रूक्का गांव की आदिवासी लड़कियां तमाम बाधाओं को पार करते हुए इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने गई थीं। खबर यह भी है कि जब इन लड़कियों ने पासपोर्ट आदि हासिल करने के लिए आवेदन किया, तो स्थानीय अफसरों ने उनके साथ बदसुलूकी की थी। स्पेन के मीडिया ने तो इन लड़कियों को हिकारत भरे ‘सुपरगोट्स’ नाम से संबोधित किया था, क्योंकि ये लड़कियां नंगे पांव ही फुटबॉल खेलती थीं। असल में, वे नहीं चाहती थीं कि जो महंगे जूते उन्हें मिले हैं, उन्हें प्रैक्टिस के दौरान ही खराब किया जाए। शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय टीमों को देखकर उन्हें थोड़ी दिक्कत हुई, मगर वे संभल गईं। जब उन्हें सांत्वना पुरस्कार देने का ऐलान हुआ, तो उनमें से कई अपने आंसू रोक नहीं सकीं। भारत के एक पिछड़े इलाके की, जो बाल विवाह एवं महिलाओं एवं बच्चियों की तस्करी के लिए कुख्यात है, लड़कियों की यह जीत नई उम्मीद पैदा करती है।
इसने खेल जगत के ही एक अन्य प्रसंग की याद ताजा कर दी है, जब कुछ वर्ष पूर्व ओडिशा के अत्यधिक पिछड़े कहे गए आदिवासी जिलों के किशोर एक वर्ल्ड कप जीतकर लौटे थे। यह जुदा बात है कि यह कोई ट्वंटी-20 वर्ल्ड कप नहीं था, जिस पर लोगों का ध्यान जाता। अहम बात यह थी कि 14 साल से छोटे इन किशोरों की वह टीम एक ऐसे खेल में विश्व चैंपियन बन कर लौटी थी, जो खेल हिंदुस्तान में उतना खेला भी नहीं जाता। फुटबॉलनुमा इस खेल को रग्बी कहा जाता है।
ऐसे वक्त में जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्ययन ने उजागर किया है कि ‘आजादी के साठ साल बाद भी स्कूलों में आदिवासी बच्चों के साथ भेदभाव जारी है’ और नस्लवाद के बारे में यह बात सामने आई है कि वह किस तरह लोगों की प्रतिभाओं को निखरने नहीं देता, झारखंड की किशोरियों की यह कामयाबी या उससे पहले ओडिशा के किशोरों में नजर आया पराक्रम खेलप्रेमियों को उत्साहित कर सकता है।
यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि रूक्का गांव की इन किशोरियों ने कभी अपने जीते-जी मिथक बने उस महान अश्वेत धावक जेसी ओवेंस का नाम सुना होगा, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह किशोरावस्था में नंगे पांव दौड़ते हुए घोड़े को भी मात देता था, जिसने बर्लिन में आयोजित ओलंपिक में कई स्वर्ण पदक हासिल किए और जिनसे जर्मनी के तत्कालीन हुक्मरान हिटलर ने अश्वेत होने के नाते हाथ मिलाने से इनकार किया था। उन्हें इस बात का एहसास भी न हो कि अपनी इस जीत से उन्होंने ऊंच-नीच अनुक्रम पर टिके यहां के सामाजिक ढांचे पर, जिसने सीढ़ीनुमा गैरबराबरी को वैधता ही नहीं, पवित्रता प्रदान की है और जिसने समाज के व्यापक हिस्से को शिक्षा या अन्य लाभप्रद अवसरों से दूर रहने के लिए फलसफा तैयार किया है, एक और बड़ा ‘गोल’ किया है।
आदिवासी किशोरों की यह उपलब्धि भारतीय मूल के एक शख्स द्वारा अमेरिका में हासिल की गई कामयाबी और उसके उद्योग की अभिनव भर्ती नीति की याद ताजा करती है। एक ओबीसी परिवार में जन्मे इस शख्स का नाम माइकल थेवर है। उन्होंने एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी कहे जाने वाले मुंबई के धारावी में बचपन बिताया और मुंबई की सड़कों पर ही पाव बेचकर गुजर-बसर की। माइकल आज फिलाडेल्फिया स्थित 160 करोड़ टर्नओवर वाली 'टेम्प सॉल्यूशन' नामक कंपनी के मालिक हैं। टेम्प सॉल्यूशन दुनिया की अकेली ऐसी कंपनी है, जहां चयन की एक ही पात्रता है- सामाजिक और आर्थिक रूप से सताए हुए तबके के लोग।
चाहे झारखंड की उन लड़कियों की बात हो या ओडिशा के किशोरों की या फिर माइकल थेवर की, एक बात स्पष्ट है कि योग्यता का होना या न होना सापेक्ष चीज है, जो अवसरों के उपलब्ध होने या न होने से सीधी जुड़ी हुई है।