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मुखर होती लड़कियां और रूढ़िवादी शादी

Fri, 16 Jan 2015 08:40 PM IST
मनीषा सिंह
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देश में जागरूकता बढ़ने से मां-बाप अपनी लड़कियों को अच्छी शिक्षा देने लगे हैं। लड़कियां भी बैंकिंग, प्रबंधन और आईटी जैसे सेक्टरों में नौकरी को ज्यादा प्राथमिकता देने लगी हैं। पर हमारे आधुनिक समाज की विडंबना यह है कि लड़कियां भले पढ़ी-लिखी और अच्छी नौकरी में हों, उन्हें शादी परिवारवालों की मर्जी से करनी पड़ रही है। आधुनिकता के तमाम दावों के बीच समाज में विवाह का संरक्षणवादी रूप यानी अरेंज्ड मैरेज दहेज के साथ लौटने लगा है। इसकी जानकारी ऑनलाइन शादी कराने वाली एक वेबसाइट, शादी डॉटकॉम, द्वारा कराए गए सर्वेक्षण से मिलती है। इस सर्वेक्षण में शामिल 5,680 लड़कियों से जब पूछा गया कि शादी तय होने के बाद अगर उन्हें पता चलता है कि वर पक्ष की ओर से दहेज की मांग की गई है, तो वे क्या करेंगी? 51.4 फीसदी लड़कियों का जवाब था कि वे शादी रद्द कर देंगी। करीब 49 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वे ससुराल पक्ष की इस मांग को समाज में बताकर उनके इरादे जगजाहिर कर देंगी। लगभग 60 फीसदी लड़कियों ने दहेज मांगने वालों को जेल भेजने की बात कही।
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तो फिर समाज में दहेज क्यों कायम है? इसके संकेत संरक्षणवादी शादी में छिपे हैं। शादी डॉटकॉम के साथ-साथ पिछले साल एक टीवी न्यूज चैनल ने देश के 18 राज्यों में 30 हजार युवाओं में एक सर्वे कराया था, जिसमें दो-तिहाई (74 फीसदी) ने कहा था कि गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के इस जमाने में भी वे शादी मां-बाप की मर्जी से ही करेंगे। जो युवा पढ़ाई-नौकरी से लेकर लाइफ स्टाइल तक में मां-बाप और समाज का दखल नहीं चाहता, वह शादी का मामला उठते ही रूढ़िवादी क्यों हो जाता है? क्या ऐसा वह समाज के दबाव या कुछ मामलों में सामाजिक भय (खाप पंचायतों का) के कारण करने लगा है या उसकी सोच ही इसके लिए प्रेरित कर रही है? ज्यादा समय नहीं हुआ, जब मुंबइया फिल्मों के असर से युवा प्रेम विवाह को सही फैसला मानने लगे थे। पर अपने देश में यह क्रांति दो-तीन दशक भी नहीं चली। इधर जैसे हमारा सिनेमा यथार्थवादी हुआ, शादी को लेकर हमारे युवा संरक्षणवादी होने लगे।

शादी में रूढ़ियों के लौटने के इस चलन के दो-तीन स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक कारण हैं। पिछले अरसे में युवाओं ने प्रेम-विवाहों के बुरे हश्र की अनगिनत खबरें सुनी हैं। खाप पंचायतों का असर तो बढ़ा ही है, महानगरों में शादियों के टूटने के सिलसिले ने भी जोर पकड़ा है। एक आकलन कहता है कि समाज की कड़वी हकीकत से तालमेल बिठाने में नाकाम रहने के कारण अकेले दिल्ली और मुंबई में ही हर साल 10 हजार शादियां टूट रही हैं। एकल परिवार में नवदंपतियों के बीच मामूली कहासुनी और झगड़ों को सुलटाने वाली वह सामाजिक व्यवस्था नदारद है, जो संयुक्त परिवारों के रहते कायम थी। पर दहेज हमारा पीछा आखिर क्यों नहीं छोड़ रहा? असल में, तय की गई शादी के साथ दहेज एक अनिवार्यता के रूप में इसलिए जुड़ा हुआ है, क्योंकि वर पक्ष को समाज में दर्शाना है कि बहू उनके यहां खाली हाथ नहीं आई।
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ऐसे में, लड़कियों को ही तय करना है कि वे क्या चाहती हैं। अच्छी शिक्षा और शानदार नौकरी के बावजूद वे दहेज की मांग के साथ अरेंज मैरिज करना चाहती हैं या अपने विकल्प खुले रखने की हामी हैं? दहेज का विरोध करने वाली लड़कियों में से 10 प्रतिशत भी अपने कहे पर कायम रहीं, तो वे समाज को बदल सकती हैं।
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