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कॉर्पोरेट को कर्ज का उपहार

Mon, 09 Dec 2013 08:15 PM IST
सुभाषचंद्र कुशवाहा
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कहा जाता है कि कानून के हाथों ज्यादातर गरीबों की ही गर्दन फंसती है। अमीर अपनी गर्दन हर व्यवस्था में बचा ले जाता है। आज उदारीकृत अर्थव्यवस्था का वर्ग चरित्र, कॉर्पोरेट हितैषी और गरीब विरोधी है। वह जिस बाजारीकृत अर्थव्यवस्था का निर्माण कर चुका है, वहां मुनाफा कमाना ही एक मात्र ध्येय है। इस अर्थव्यवस्था के वाहक, कॉर्पोरेट जगत, अपनी हानि में सत्ता और समाज को भागीदार बनाना जानता है, मगर लाभ को साझा करना नहीं जानता। लाभ कमाने के लिए उसे हर रियायत चाहिए। गरीबों की आत्महत्या से भी उसे गुरेज नहीं।
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हाल के वर्षों में उद्योग जगत की दो हस्तियों के मामलों की चर्चा से हर कोई वाकिफ है। किंग फिशर स्वामी विजय माल्या पर भारतीय स्टेट बैंक सहित विभिन्न बैंकों का 7,000 करोड़ रुपये बकाया होने और बार-बार वसूली का तकादा करने के बावजूद, बकाया चुकता न करने और अपनी दूसरी कंपनियों के व्यवसाय से करोड़ों कमाने का क्रम जारी रहा है। उन्होंने कर्ज अदायगी से बचने के लिए किंग फिशर को दिवालिया हो जाने का नाटक रचा और भारी-भरकम कर्ज की अदायगी से बचने के लिए ही तमाम कुचक्रों का सहारा लिया। उनके ऐशो आराम में कोई कमी नहीं आई और न उनके शराब कारोबार को कोई नुकसान पहुंचा।

किंग फिशर के जहाजों और दूसरी परिसंपत्तियों को अगर बैंक बेच भी लेते हैं, तो महज 1,000 करोड़ रुपये ही वसूल पाने की स्थिति में होंगे। यहां सरकार की भूमिका मूकदर्शक बने रहने की है। जबकि कर्ज में दिया गया यह पैसा आम जनता का है।
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दूसरा प्रकरण सहारा समूह प्रमुख सुब्रत राय का है। सहारा समूह ने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्देशों के बाद भी निवेशकों का 24,000 करोड़ रुपये अभी तक सेबी के पास जमा नहीं किया है। वह बार-बार अपने वकील के माध्यम से यह कुतर्क दे रहा है कि निवेशकों के 22,000 करोड़ रुपये को पुनर्निवेश किया गया है।

इस प्रकार हम देखें, तो जहां एक ओर दस-बीस हजार के कर्ज के कारण किसानों की कुर्की और गिरफ्तारी हो जाती है, कुर्की के डर से वे आत्महत्या कर लेते हैं, वहीं अरबों की रकम डकार जाने के बाद भी कॉर्पोरेट घरानों का कुछ नहीं बिगड़ता। सरकार की सहानुभूति, उसकी जनपक्षधरता पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है।

याद कीजिए वर्ष 2008 को, जब किसानों के 60,000 करोड़ कर्ज माफ करने की घोषणा की गई थी, तब भारतीय कॉर्पोरेट जगत ने सबसे ज्यादा हायतौबा मचाई थी। उसका कहना था कि किसानों के कर्ज माफ करने से भारतीय बैंकों की साख गिरेगी, वे दिवालिया हो जाएंगे और अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाएगी। आज हकीकत दूसरी है। किसानों के कर्ज से कहीं ज्यादा कर्ज कॉर्पोरेट घराने डकार गए हैं। अब तक तीन लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या, तमाम प्रकार की सब्सिडी कटौती के बावजूद, भारतीय किसानों ने देश की अर्थव्यवस्था को संभाले हुआ है, जबकि कॉर्पोरेट जगत एक लाख करोड़ बैंक कर्ज को निगलने की नीति पर चल रहा है।

किसानों को कर्ज आसानी से नहीं मिलते। कर्ज देने के पूर्व बैंक अधिकारी को घूस देनी पड़ती है। उसके बाद बैंक गारंटी के रूप में जमीन के कागज, मकान, दुकान, ट्रैक्टर आदि बैंक के पास गिरवी रखने पड़ते हैं। मगर कॉर्पोरेट घरानों को कर्ज देते समय उनकी साख ही काफी होती है। इन घरानों को उनकी हैसियत से ज्यादा कर्ज दे दिया जाता है।

गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी और किसानों के कर्ज माफी को मुद्दा बनाने वाले कॉर्पोरेट घरानों ने विगत 13 वर्षों में एक लाख करोड़ रुपये कर्ज को, जिनमें से 95 प्रतिशत बड़ा कर्ज था, वसूल न होने योग्य घोषित करा लिया है। यह बात स्वयं रिजर्व बैंक के उप गवर्नर के सी चतुर्वेदी स्वीकार कर चुके हैं।

कॉर्पोरेट घरानों के ऊपर वसूली का वैसा शिकंजा नहीं कसता, जैसा आम आदमी पर कसता है। यहां कानून की नजर में हर कोई बराबर नहीं दिखता। आज भी सत्ता का उपभोग वही धनिकतंत्र कर रहा है, जो राजतंत्र और विदेशी सत्ता के अधीन करता आया था।
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