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लत और रिश्ते: डिजिटल दुनिया में फंसे युवा मन की भयावह सच्चाई

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 05 Feb 2026 06:38 AM IST

सार

गाजियाबाद की तीन बहनें हों या झाबुआ या भोपाल की घटनाएं, केंद्र में सवाल यही है कि क्या हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहां आभासी दुनिया, वास्तविक दुनिया पर हावी हो रही है।
 
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डिजिटल विचार - फोटो : अमर उजाला


गाजियाबाद की घटना प्रथमदृष्टया इसका ही नतीजा दिखती है। अब तक मिली जानकारियां बताती हैं कि 12, 14 और 16 वर्ष की तीनों किशोरियों को एक मोबाइल गेम की लत थी, हालांकि पुलिस ने इसे खारिज किया है। पिता के मना करने पर उन्होंने यह कदम उठाया, जिसकी पुष्टि उनके सुसाइड नोट से भी होती है। मामले की विधिवत जांच तो चल ही रही है, जिससे सच सामने भी आ जाएगा, लेकिन सुसाइड नोट और पिता के बयान से यह तो स्पष्ट है कि ऐसी त्रासदियों में परिवार की भूमिका पर आत्ममंथन जरूरी है। अधिकांश परिवार आज भी बच्चों के डिजिटल व्यवहार को या तो पूरी तरह से नजरअंदाज करते हैं, या फिर अचानक सख्ती से नियंत्रित करने की कोशिश करने लगते हैं। दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं। हालांकि समस्या सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।


गाजियाबाद की घटना वास्तव में उस व्यापक सामाजिक संकट का हिस्सा है, जिसमें ऑनलाइन गेम्स, सोशल मीडिया या रील्स की लत इन्सानी रिश्तों, संवेदनाओं और जीवन-मूल्यों पर हावी होती जा रही है। कुछ ही दिन पहले मध्य प्रदेश के झाबुआ में एक पत्नी ने अपने पति की हत्या इसलिए कर दी, क्योंकि वह उसे रील्स बनाने से रोकता था। यही नहीं, हाल ही में भोपाल में एक चौदह वर्षीय छात्र ने भी मोबाइल गेमिंग की लत के चलते फांसी लगा ली थी। इस तरह के संकट परिवारों के लिए आईना हैं। एक मासूम शौक की तरह शुरू होने वाली डिजिटल लत चुपचाप पनपती है और जब कोई इन्हें रोकने की कोशिश करता है, तब टकराव शुरू होता है।


गाजियाबाद और भोपाल की घटनाओं में शायद यह टकराव भीतर ही पनपता रहा, जबकि झाबुआ में यह हिंसा में बदल गया। तीनों ही स्थितियों में रिश्ते हार गए और स्क्रीन की लत जीत गई। गाजियाबाद की बहनें हों या झाबुआ या भोपाल की घटनाएं, केंद्र में सवाल यही है कि क्या हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहां आभासी दुनिया, वास्तविक दुनिया पर हावी हो रही है।


 
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