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कश्मीर की हकीकत समझें

मारूफ रजा
Updated Fri, 12 Aug 2016 07:01 PM IST
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मारूफ रजा
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में कश्मीरियों के बेहतर भविष्य की इच्छा जताई है, जो पहले के राजनेताओं द्वारा किए गए इसी तरह के दावों की लंबी सूची के समान ही है, जिनमें वायदे तो बहुत थे, लेकिन जमीनी स्तर पर उन पर अमल कम ही नजर आया। इसके अलावा नियमित रूप से पाकिस्तानी उच्चायुक्त को तलब करके घाटी में पाकिस्तान के दखल देने के लिए उन्हें चेतावनी देने की भी कोई खास प्रासंगिकता नहीं है, क्योंकि इससे कश्मीर मुद्दे का समाधान नहीं निकल सकता। इसलिए कश्मीर मुद्दे से निपटने के लिए एक यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद पैदा हुआ मौजूदा संकट स्पष्ट रूप से स्थिति से ठीक से नहीं निपटने का मामला है। इसके परिणामों के बारे में किसी को भी घाटी की स्थिति एवं मनोदशा की सीमित समझ के साथ अनुमान लगाना चाहिए था। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और दिल्ली के नेतृत्व, दोनों वहां की स्थिति की गंभीरता से अनभिज्ञ थे। दिल्ली एवं श्रीनगर के हमारे असहाय राजनेताओं और नौकरशाहों की प्रतिक्रिया है कि 'हम और क्या कर सकते हैं?'


नई शुरुआत करने के लिए सबसे पहले तो वे अपने नजरिये में बदलाव कर सकते हैं। इसकी शुरुआत वे घाटी में मौजूद भारत विरोधी तत्वों और पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं के खिलाफ सोशल मीडिया पर व्यापक रूप में जवाबी अभियान चलाकर कर सकते हैं। दूसरा, भारत के खिलाफ पाकिस्तान जो कहानियां गढ़ रहा है, उसे इस सच्चाई के साथ चुनौती दी जा सकती है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों (संघर्ष विराम की स्थिति) को लागू करने में पाकिस्तान विफल रहा है। इसके साथ ही साउथ ब्लॉक में फैले इस भय को दूर कीजिए कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का जिक्र करने पर कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण हो जाएगा और भारत के लिए असहज स्थिति पैदा हो जाएगी। तीसरी बात, भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को अपने चुनावी लक्ष्यों को किनारे रखकर कश्मीर में पीडीपी-भाजपा शासन के प्रति कठोर रुख अपनाना चाहिए। और आखिर में नई दिल्ली को जम्मू-कश्मीर में वित्तीय पहल की अपनी सार्वजनिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहिए, जो उसे नई दिल्ली में मजबूती से निपटने में मदद करेगा।


एक बार जब इन सबको अपना लिया जाता है, तो फिर नई दिल्ली को पूरी ताकत से अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजित करने वाले मुल्क के रूप में घोषित करने के लिए दबाव बनाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बीच, दुनिया भर में अनेक सार्वजनिक मंचों पर भाषण दिए हैं, जिन्हें सराहा भी गया, लेकिन शायद ही कोई बता सके कि उन्होंने किसी भाषण में जोर देकर कहा हो कि पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित करने वाला मुल्क है। अपने भाषणों में उन्होंने केवल परोक्ष रूप से इसका उल्लेख किया है।


अफसोस की बात है कि मौजूदा सरकार में कई ऐसे लोग हैं, जो नवाज शरीफ के साथ बेहतर रिश्ते बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्प है, जिनकी जर्जर असैन्य सरकार लोकतंत्र के छद्म नृत्य में शामिल है, हालांकि पाकिस्तानी सेना और उसके मौजूदा प्रमुख जनरल राहिल शरीफ तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। और कोई भी अनुमान लगा सकता है कि पाकिस्तानी सेना शीघ्र ही फिर से सत्ता पर कब्जा कर सकती है।


हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकार को समझना चाहिए कि पाकिस्तानी सेना पाकिस्तान की सत्ता संरचना में अपनी प्रमुखता बरकरार रखने के लिए भारत के साथ शत्रुता को जिंदा रखना चाहती है। इसलिए उसकी नजर हमेशा कश्मीर पर केंद्रित रहती है। तथ्य यह भी है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वही समझौते टिकाऊ रहे हैं, जिन पर पाकिस्तानी सेना ने हस्ताक्षर किए हैं, मसलन, संघर्ष विराम रेखा, नियंत्रण रेखा और सिंधु जल संधि। इसलिए पाकिस्तानी सेना की अनदेखी करके भी कश्मीर से संबंधित बहस से हम उन्हें अलग नहीं रख सकते।


सबसे ज्यादा निराशा यह देखकर होती है कि हमारी एक के बाद एक आने वाली सरकारें आतंकी हमलों के खिलाफ चारे के रूप में हमारे सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करती हैं। निस्संदेह हमारे सुरक्षा बलों ने हमेशा अच्छा काम किया है। विफलता तो हमारे राजनेताओं में निहित है। कश्मीर मुद्दे को लेकर नई दिल्ली के नजरिये में कोरी अयोग्यता और कल्पनाशीलता की कमी मुख्य रूप से परिलक्षित होता है। हर बार यही उम्मीद की जाती है कि यह समस्या सुलझ जाएगी और सब कुछ पहले की तरह ठीक-ठाक हो जाएगा, जहां नई दिल्ली का काम निर्बाध रूप से कश्मीरी राजनेताओं को धन उपलब्ध कराना होगा (जिसका कुछ ही अंश वहां के लोगों को मिलता है), क्योंकि नई दिल्ली को उम्मीद रहती है कि वे इसके बदले वहां पहले की तरह भारत समर्थक बातें शुरू करवाएंगे, जबकि वहां के लोग इसका समाधान तलाशते हैं, जिसमें हर बार उन्हें विफलता मिलती है।
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जहां तक सेना की बात है, तो हमारे अधिकारी हमेशा की तरह आगे भी बेहतर काम करेंगे। लेकिन सेना भारत विरोधी तत्वों को खत्म करके स्थितियों को संभालती रहे और राजनेता लोगों के दिलो-दिमाग को जीतने के लिए कार्यक्रमों को लागू न करें, तो इससे समस्या का समाधान निकलना मुश्किल है। दुख की बात है कि वर्ष 1990 से कम से कम तीन बार हर सात-आठ वर्षों पर कश्मीर घाटी में स्थिति सामान्य रही है, लेकिन हमारे देश के नीति-निर्माता इसका फायदा उठाने में विफल रहे। इसलिए अगर हम इसमें सुधार नहीं करते, तो एक लंबे समय तक इस समस्या के जूझने के लिए हमें तैयार रहना होगा, जो हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है।


लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं
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