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गुलामी के दौर का कानून लागू है

Thu, 11 Aug 2016 07:05 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
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सुभाषिनी सहगल अली
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इस बार 15 अगस्त को आजादी की सत्तरवीं वर्षगांठ है। अपने गौरवशाली स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के कुछ मील के पत्थरों को याद करने का यह अच्छा मौका है। जलियांवाला बाग में अंग्रेज सैनिकों के हाथों हुए निहत्थे भारतीय बच्चे, महिलाओं और पुरुषों का कत्लेआम इनमें से एक है। उस घटना के बाद यह बहस छिड़ गई थी कि क्या सेना बेकसूर लोगों को मारने के लिए स्वतंत्र है? इसका अंग्रेजों की तरफ से एक ही उत्तर मिला-सत्ता की हिफाजत में उनकी सेना को कुछ भी करने की छूट है।
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जिस कानून के तहत अंग्रेज सैनिकों को लोगों को गोलियों से भून देने की छूट थी, उसी तरह का कानून आज भी हमारे देश में मौजूद है। इसे अफस्पा या सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून कहते हैं, जिसे 1958 में पारित किया गया था। इस कानून को उन विशेष स्थानों में लागू किया जाता है, जहां सरकार के अनुसार, विशेष परिस्थितियां मौजूद हैं। जहां-जहां यह कानून लागू किया गया है, वहां यह दशकों से लागू है। पूर्वोत्तर के इलाके में केवल त्रिपुरा ही है, जहां की माकपा सरकार ने इसे हटा दिया है। इस कानून के हटने के बाद वहां आतंकवादी गतिविधियों में वृद्धि नहीं हुई है।

मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला ने कुछ ही दिन पहले सोलह साल से जारी अपनी भूख हड़ताल खत्म की। उनकी यह भूख हड़ताल दो नवंबर, 2000 को शुरू हुई थी। उस दिन मणिपुर के मलोम शहर के एक बस अड्डे पर बस का इंतजार कर रहे दस लोगों को असम राइफल्स के जवानों ने मार डाला था। मरने वालों में बासठ साल की एक महिला के अलावा अट्ठारह साल की सिनम चंद्रमणि थीं, जिन्हें 1988 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिला था। उसी दिन से अफस्पा को हटाने की मांग के साथ शर्मिला ने अपनी भूख हड़ताल शुरू की थी। उनकी भूख हड़ताल खत्म करने के कुछ ही दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने अफस्पा के बारे में कहा कि सैनिकों और अर्धसैनिक बल के जवानों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कानून के ऊपर नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कहा कि जहां भी इस कानून को लंबे समय से लागू किया गया है, वहां इसे मानवाधिकार के सिद्धांतों की परिधि के अंदर लाना होगा, और अगर अधिक ताकत के प्रयोग की शिकायत होती है, तो उसकी जांच करना अनिवार्य होगा। यह स्वागतयोग्य फैसला है। आजादी की सत्तरवीं वर्षगांठ के समय इसका आना और भी खुशी की बात है।
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लेकिन इस फैसले के कुछ ही दिन बाद कश्मीर में भीड़ पर सैन्य और अर्धसैनिक बल की तरफ से छर्रों की बौछार होने लगी। वहां अनेक लोग मर चुके हैं और सैकड़ों लोगों की आंखों की रोशनी जा चुकी है। आंख के कई डॉक्टर इस बीच श्रीनगर भेजे गए थे। उनमें से एक डॉ. सुंदरम नटराजन का कहना है कि आंख के जैसे घाव उन्होंने श्रीनगर में देखे, वैसे कहीं, किसी को देखने को नहीं मिले होंगे। दिल्ली के एम्स में चौदह साल की इंशा भर्ती है। उसकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई है। वह अपनी मां के साथ अपने घर की खिड़की से सड़क का नजारा देख रही थी कि तभी एक सैनिक ने बंदूक चलाई और उसकी दोनों आंखों को बेनूर कर दिया।

15 अगस्त खुशियों का दिन है। उसे हर नागरिक के लिए खुशी का दिन बनाना हमारी बड़ी जिम्मेदारी है। जिस आजादी के लिए हमारे पुरखों ने अपनी शहादत दी, उसके संदेश को हर घर तक पहुंचाने की भी हमारी बड़ी जिम्मेदारी है।
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-लेखिका माकपा पोलितब्यूरो की सदस्य हैं
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