भू-राजनीतिक मतभेद के बीच चीन में बदलाव
पड़ोसी देशों के साथ भू-राजनीतिक झगड़ों के प्रति अपने रवैये में चीन बदलाव का अनुभव कर रहा है। ऐसे में भारत के साथ मानचित्र विवाद से लाभ उठाने की नेपाल की रणनीति काम नहीं कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संभालने के अपने रवैये में बदलाव के तहत चीन ने अप्रत्याशित रूप से भारत से सीमा समझौता किया है। ऐसा लगता है कि अर्थशास्त्र आखिरकार चीन-भारत संबंधों को प्रभावित करने वाली राजनीतिक समस्याओं का समाधान पेश कर रहा है।
अरबों का द्विपक्षीय व्यापार, भारत का व्यापारिक साझेदार
भू-आर्थिक झुकाव पहले ही अपनी उपयोगिता साबित कर चुका है। चीन वर्ष 2023-24 में 118.4 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के साथ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनकर उभरा है। यह असाधारण उपलब्धि तब मिली, जब दोनों देश खूनी सीमा संघर्ष में उलझे थे और भारत ने 220 चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था। अधिक आत्मनिर्भरता और बीजिंग के साथ व्यापार पर अंकुश लगाने के बावजूद भारत अब भी चीनी वस्तुओं पर बहुत ज्यादा निर्भर है। दोनों देशों के बीच मांग-आपूर्ति का बहुत बड़ा खिंचाव है और राजनीति के लिए इसे नजर अंदाज करना मुश्किल है।
एक नजर गलवां की घटना पर
गलवां की घटना के बाद सैन्य तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बाद भारत ने चीनी निवेश को सीमित कर दिया था। हालांकि, भू-आर्थिक निर्देशों का पालन करते हुए भारत ने कुछ चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण कंपनियों के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जो चीन के प्रति भारत के आर्थिक रुख में बदलाव का संकेत है। इससे पता चलता है कि भू-राजनीतिक तनाव अस्थायी रूप से भू-आर्थिक संबंधों को पटरी से उतार सकते हैं, पर उन्हें लंबे समय तक कमजोर नहीं कर सकते।
दो कारणों का मूल आधार समझिए
इसे दो कारणों से समझा जा सकता है कि चीन अचानक भू-अर्थशास्त्र की ओर क्यों मुड़ रहा है। पहला, यह कि बड़े पैमाने पर उत्पादित चीनी वस्तुओं के प्रति पश्चिम में रुचि घट रही है। ट्रंप प्रशासन ने लगभग 300 अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर व्यापक टैरिफ लगाया था। राष्ट्रपति जो बाइडन ने न केवल उस टैरिफ को बरकरार रखा, बल्कि लगभग 15 अरब डॉलर के चीनी आयात पर कुछ टैरिफ दरों को बढ़ाने का फैसला किया। यूरोपीय देशों ने भी चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों के आयात पर 45 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने पर अमेरिका का अनुसरण किया।
दूसरा, यह स्पष्ट संकेत है कि ग्लोबल साउथ पश्चिमी प्रभाव से बाहर निकल रहा है। लगता है कि चीन 'महान शक्ति' के रूप में अपनी नई-नई स्थिति से बहक गया है, और अपनी कथित 'शांतिपूर्ण वृद्धि' की परिकल्पना से बाहर नीतिगत मामलों में मुखर हो रहा है। चीन अक्सर भारत सहित कई पड़ोसी देशों के साथ क्षेत्रीय विवादों को उकसाता है। पश्चिम ने चीन की धमकियों का इस्तेमाल एक नए भू-राजनीतिक मंच का आधार बनाने के लिए किया, जो बीजिंग के अनियंत्रित व्यवहार का मुकाबला कर सके। एक नया भू-राजनीतिक समूह हिंद-प्रशांत ‘चीन को रोकने’ के लिए समर्थन जुटाने की खातिर सामने आया। अचानक, चीन विरोधी बयानबाजी ने जोर पकड़ लिया और कई देश बीजिंग को सबक सिखाने के लिए ‘सैन्य गठबंधन’ की बात करने लगे।
इन सबने चीन के निर्यातोन्मुखी विकास मॉडल को कमजोर करना शुरू कर दिया, जिसके विनिर्माण उद्योगों को पश्चिमी बाजारों की जरूरत है। उधर संयुक्त पश्चिम ने चीनी वस्तुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का कदम उठाया। अचानक, 'चीनी वस्तुओं के खिलाफ टैरिफ' चीन विरोधी भावनाओं को बढ़ाने के लिए चर्चा का एक नया विषय बन गया।
चीन का आश्वासन
बढ़ते टैरिफ के जरिये पश्चिमी दबावों का मुकाबला करने के लिए चीन ने ब्रिक्स को एक उपयुक्त मंच के रूप में देखना शुरू किया, जो उसके रणनीतिक घेरे के लिए एक प्रतिकारक शक्ति बनाने में मदद कर सकता है। ब्रिक्स के सफल विस्तार ने चीनी नेतृत्व को आश्वस्त किया कि पश्चिमी प्रभुत्व लुप्त हो रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने महसूस किया कि ग्लोबल साउथ के साथ ब्रिक्स की निकटता पश्चिमी प्रभुत्व को कम करने की क्षमता रखती है। इस बिंदु पर चीन ने भू-राजनीतिक सक्रियता से बाहर निकलने के लिए निर्णायक कदम उठाए और विशाल विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने के लिए भू-अर्थशास्त्र को एक नए तरीके से अपनाने के संकेत दिए। ग्लोबल साउथ का अभिन्न अंग भारत सहज ही बीजिंग की प्राथमिकता बन गया।
चीन का दावों का हवाला
चीन के भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से परिचित नेपाल ने लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा जैसे भारतीय क्षेत्रों पर क्षेत्रीय दावों का हवाला दिया। नेपाल ने ऐसा चीन को खुश करने के लिए किया, हालांकि वह इससे अनजान है कि बीजिंग के नेतृत्व ने भू-अर्थशास्त्र का फायदा उठाने के लिए चुपचाप काम किया है। नेपाल की विदेश नीति में बदलाव से भारत की चिंताएं बढ़ सकती हैं, जो परंपरागत रूप से नेपाल को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
नेपाल में चीन का प्रभाव भारत के लिए चिंता
नेपाल में चीन का बढ़ता प्रभाव दक्षिण एशिया में भारत के लिए संभावित रणनीतिक घेरेबंदी के बारे में भी चिंताएं बढ़ाता है। हालांकि, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीन ने भू-आर्थिक वास्तविकताओं को खुले तौर पर अपनाकर कई लोगों को हैरान कर दिया। भारत के साथ सीमा विवाद को शांत करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर करके चीन ने परिपक्वता का परिचय दिया है। चीन का यह यू-टर्न इतना अचानक नहीं है, बल्कि यह व्यवस्थित रूप से पश्चिमी दबावों के कारण है।
देखिए भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने भी समझ लिया है कि मांग-आपूर्ति मैट्रिक्स को बनाए रखना लंबे समय तक संभव नहीं हो सकता है। इस प्रकार, संकेत मिल रहे हैं कि नई दिल्ली और बीजिंग के बीच महान एशियाई शक्ति का खेल भू-राजनीतिक मैदान पर नहीं, बल्कि भू-आर्थिक धरातल पर लड़ा जा सकता है। एशिया के दो दिग्गजों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग साथ-साथ चल सकते हैं।