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घोटाले का नगीना

नारायण कृष्णमूर्ति Updated Mon, 19 Feb 2018 11:40 AM IST
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नीरव मोदी

पंजाब नेशनल बैंक द्वारा शेयर बाजारों और जांच एजेंसियों से जौहरी नीरव मोदी के खिलाफ 11,300 करोड़ रुपये के फर्जी लेनदेन की शिकायत दर्ज करवाने के बाद उठे तूफान से जर्जर बैंकिंग व्यवस्था की खामियां उजागर हो गई हैं। इससे जुड़ी खबरों ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को जन्म दिया है, जिससे यह बात गौण हो गई है कि आखिर बैंकिंग व्यवस्था, फिर वह निजी बैंक हों या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, की समस्याओं का समाधान क्यों नहीं तलाशा जा सका है।



पिछले कुछ वर्षों के दौरान बैंकों से संबंधित धोखाधड़ी के अनेक मामले सामने आए हैं, जिनमें सिंडिकेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और यहां तक कि सिटी बैंक से जुड़े मामले शामिल हैं। इनसे पता चलता है कि बैंकिंग की प्रणाली में ही ऐसी खामियां हैं, जिसके कारण धोखाधड़ी के ऐसे मामले दोहराए जा रहे हैं। ऐसी धोखाधड़ी को अंजाम दिए जाने के पीछे एक अहम कारक बैंक के भीतर की वह मशीनरी भी है, जिसे व्यवस्था की खामियों की जानकारी होती है। यदि बैंकिंग व्यवस्था में कमी और खामियां नहीं होतीं, तो इस घोटाले को अंजाम नहीं दिया जा सकता था। बैंक के ही कुछ कर्मचारी कारोबारियों को उन खामियों से अवगत कराते हैं और उन्हें अनधिकृत फायदा पहुंचाते हैं। कारोबारी कानून और व्यवस्था में मौजूद गड़बड़ियों का फायदा उठाने से गुरेज नहीं करते।


जमीन के सौदों के विपरीत, जिनमें जमीन के रूप में जमानत या प्रतिभूति मौजूद रहती है, और जिसमें मालिकाना हक निर्धारित किया जा सकता है, आभूषणों और हीरे के मामले में सवालों के घेरे में आए सामान के मालिक का निर्धारण करना कठिन होता है। दरअसल अधिकांश मामलों में कर्ज वास्तविक कीमत के आधार पर नहीं, बल्कि आपसी भरोसे के आधार पर मिलता है। लिहाजा आभूषणों का कोई कारोबारी बाहर भेजे गए या भेजे जाने वाले एक ही माल के एवज में एक से अधिक ऋणदाताओं से कर्ज ले सकता है या विभिन्न देशों में एक से अधिक बार लेनदेन कर सकता है और बच निकलता है। इस तरह के कर्ज वैध तरीके से लेटर्स ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के जरिये मिलते हैं, जैसा कि पीएनबी के मामले में भी इनका इस्तेमाल किया गया। एलओयू किसी बैंक द्वारा अपने किसी ग्राहक के लिए किसी अन्य बैंक को दी गई गारंटी होती है, ताकि उस ग्राहक को वह बैंक कर्ज दे सके। यह लेटर ऑफ क्रेडिट या गारंटी जैसा ही होता है, बस फर्क यह है कि एलओयू का उपयोग अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेनदेन के लिए किया जाता है। यानी यदि कोई माल, जिसके लिए भारत में एलओयू जारी किया गया है, उसे हांगकांग भेजा जा सकता है और फिर वहां से वही माल हांगकांग के किसी स्थानीय बैंक से एलओयू जारी करवाकर बेल्जियम भेजा जा सकता है। बेल्जियम में इस माल को तराश कर उसे वापस भारत में बेचने के लिए भेजा सकता है और इस सारे लेनदेन का आधार एलओयू होता है। नियमों के मुताबिक, एलओयू की अवधि छह माह की होती है और उसे एक बार और छह माह के लिए बढ़ाया जा सकता है। यानी माल को बेचने के लिए छह माह की अवधि होती है और यदि कर्ज लौटाने की अवधि छह माह और बढ़वा ली जाए, तो कर्जदार को पर्याप्त समय मिल जाता है। मुश्किल तब आती है, जब कर्जदार इसका बेजा इस्तेमाल शुरू कर देता है।


नीरव मोदी के मामले में बैंक के कर्मचारियों ने उन्हें फर्जी तरीके से एलओयू जारी कर इस धोखाधड़ी को अंजाम देने में मदद की। बैंक के कर्मचारियों ने एलओयू जारी किए और इसे बैंकिंग प्रणाली में दर्ज किए बिना सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन (स्विफ्ट) के जरिये प्रसारित कर दिया, जिससे विदेशों में स्थित भारतीय बैंकों को नीरव मोदी के लिए कर्ज जारी करने के निर्देश पहुंच गए।


इस मामले में हो सकता है कि नीरव मोदी ने वास्तव में पीएनबी से लेटर ऑफ क्रेडिट ले रखा हो, जिसका इस्तेमाल दूसरे बैंकों से कर्ज लेने के लिए किया गया हो, जैसा कि आभूषण कारोबारी अक्सर अपना कारोबार बढ़ाने के लिए करते हैं। पर चूंकि नोटबंदी और नकदी लेनदेन से संबंधित नियमों में बदलाव के बाद आभूषण के कारोबार में भुगतान की चुनौती सामने आई है। इसका असर कर्ज की इस व्यवस्था पर भी पड़ा है। वास्तव में कर्ज की इस व्यवस्था की पूरी शृंखला है, जिसकी परिणति पीएनबी में हुई धोखाधड़ी के रूप में दिख रही है। नीरव मोदी के परिवार वालों पर 2017 में भी छापे डाले गए थे, पर उस समय कुछ भी सामने नहीं आ सका था। बैंक अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इस धोखाधड़ी को अंजाम दिया ही नहीं जा सकता था। अब बैंकों में निगरानी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि इससे छोटे और खुदरा ग्राहकों का बैंकिंग प्रणाली से विश्वास उठ जाएगा। इसका असर पीएनबी के शेयरों में आई गिरावट के रूप में दिख रहा है, जिसके कारण बैंक के शेयरों में निवेश करने वाले निवेशकों की बचत पर असर पड़ेगा। अब इस बात की आशंका बढ़ गई है कि दूसरे बैंकों में भी ऐसी गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं, जिनका पता शायद आगे की जांच से चले।


जो लोग रियल एस्टेट की दुनिया में एक ही प्रापर्टी को दो लोगों को बेचे जाने जैसी घटनाओं से वाकिफ हैं, वे नीरव मोदी मामले को आसानी से समझ सकते हैं। नियामकों और बैंकों को ऐसे घोटाले रोकने के लिए सेंट्रल रजिस्ट्री ऑफ सिक्योरिटाइजेशन एसेट रिकंस्ट्रक्शन ऐंड सिक्योरिटी इंटरेस्ट जैसी पहल करनी होगी। इसकी स्थापना एक ही संपत्ति की आड़ में विभिन्न बैंकों से कर्ज लेने जैसी धोखाधड़ी को रोकने के लिए की गई है। देश की बैंकिंग व्यवस्था पहले ही फंसे कर्ज के बोझ से दबी हुई है। 2017 में सार्वजनिक बैंकों की कुल गैरनिष्पादित संपत्ति 7.34 लाख करोड़ रुपये हो चुकी थी। पीएनबी के इस घोटाले के सामने आने के बाद कोई दावे से नहीं कह सकता कि दूसरे बैंकों में ऐसी गड़बड़ियां नहीं हो सकतीं। इस घोटाले का सबक यह है कि बैंक छोटे और बड़े कर्जदारों में फर्क न करें। 

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