हाल ही में कावेरी जल बंटवारे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है, जो तमिलनाडु की राजनीति को भावनात्मक रूप से काफी प्रभावित करने वाला है। कर्नाटक विधानसभा का चुनाव अप्रैल में होना है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों तमिलनाडु की चिंताओं पर कावेरी फैसले को लेकर चुप हैं। इन दोनों राष्ट्रीय दलों का तमिलनाडु के मुकाबले कर्नाटक में बहुत कुछ दांव पर लगा है। इस संदर्भ में शीर्ष अदालत का फैसला स्वागतयोग्य है। उसने कर्नाटक को थोड़ा ज्यादा पानी देकर दोनों राज्यों में संतुलन बनाने की कोशिश की है। पर इसकी संभावना नहीं दिखती कि कर्नाटक तमिलनाडु को उतना भी पानी देगा। वह पानी का भंडारण कर लेता है। तमिलनाडु के बारह जिले कावेरी के पानी पर निर्भर हैं। कर्नाटक ऊपर है और तमिलनाडु नीचे, ऐसे में कावेरी का पानी तमिलनाडु में स्वाभाविक रूप से पहुंचना चाहिए, पर कावेरी के डेल्टा क्षेत्र में कर्नाटक ने बांध बना दिए हैं, जिससे पानी नीचे नहीं आता। इस बार तमिलनाडु में बारिश कम हुई है, ऐसे में पानी नहीं मिलने पर मई, जून और जुलाई के महीनों में संकट गहरा सकता है। इससे राज्य की राजनीति पर भी व्यापक असर पड़ेगा। तमिलनाडु में सरकार कमजोर है, इसलिए पानी मांगने के लिए विपक्ष सरकार पर दबाव बनाएगा। द्रमुक जनता को भी भड़काएगी। हालांकि अदालत के फैसले के बाद से राज्य में फिलहाल कोई अशांति नहीं है, लेकिन देखने वाली बात होगी कि क्या मई, जून, जुलाई के महीनों में भी यह शांति बनी रहेगी और कर्नाटक तमिलनाडु को उसके हिस्से का वाजिब पानी देगा।
उधर अन्नाद्रमुक की राजनीति में आंतरिक उथल-पुथल भी तेज है। ई पलानीस्वामी के निष्क्रिय और भ्रष्ट शासन को लेकर स्थानीय राजनेता परेशान हैं। राज्य प्रशासन का कामकाज रुक गया है। अन्नाद्रमुक के मामले में केंद्र, खासकर नरेंद्र मोदी की दिलचस्पी भी लगातार घट रही है। जयललिता के निधन के बाद निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी अन्नाद्रमुक की मदद करना चाहते थे। पन्नीरसेल्वम ने कहा भी है कि मोदी के कहने पर ही उन्होंने पलानीस्वामी के साथ सुलह किया था। पर मोदी जैसे अनुभवी नेता भी तमिलनाडु में अपनी इच्छा को आगे बढ़ाने में विफल रहे, हालांकि शशिकला के परिवार पर अंकुश लगाने में केंद्र ने योगदान किया।
तमिलनाडु की राजनीति के लिए मद्रास उच्च न्यायालय के तीन प्रमुख फैसले महत्वपूर्ण होने वाले हैं। ये मामले द्रमुक के एमके स्टालिन द्वारा दायर किए गए थे। सबसे पहला मामला अट्ठारह विधायकों की अयोग्यता का है। अगर अदालत का फैसला फरवरी के अंत तक आता है, तो राज्य में अस्थिरता पैदा हो सकती है, चाहे फैसला किसी के भी पक्ष में हो।
दूसरा है गुटखा घोटाला मामला, जिसे द्रमुक ने राज्य के मंत्रियों और आईएएस/आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ दायर किया है। तीसरा है इंडोनेशिया से कोयला आयात घोटाला, जिसमें राज्य के छह मंत्री मोटे तौर पर आरोपी हैं। अदालत ने कोयला घोटाले पर सीबीआई के मामले की निगरानी की, इस जांच में अन्नाद्रमुक के नेता दोषी साबित हो सकते हैं।
राजनीतिक रूप से कहें, तो अन्नाद्रमुक का पलानीस्वामी गुट अपने कार्यकर्ताओं और पार्टी के जिला कार्यालय के अधिकारियों को निकालने में व्यस्त है। लेकिन पार्टी कार्यकारिणी में नई नियुक्तियों के कोई संकेत नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि पन्नीरसेलवम गुट को पलानीस्वामी पार्टी संगठन में समायोजित नहीं करना चाहते। वह पन्नीरसेल्वम खेमे को खत्म करने के लिए उचित मौके की प्रतीक्षा में हैं। साफ है कि अन्नाद्रमुक में सहमति नहीं है। तमिलनाडु में विपक्ष भी बंटा हुआ है। सिर्फ द्रमुक की मीडिया में चर्चा है। द्रमुक के वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर दिया गया है। एमके स्टालिन के उदय को पार्टी के पुराने नेता पसंद नहीं करते। पार्टी कार्यकर्ता स्टालिन की शैली और नेतृत्व क्षमता से नाराज हैं। द्रविड़ पार्टियों के छह गुट भी अब प्रभावी नहीं रह गए हैं।
पिछले साल तमिलनाडु की राजनीति में रजनीकांत एवं कमल हासन जैसे दो सुपर स्टारों का अचानक उदय हुआ। इन दोनों का द्रमुक के वोट में सेंध लगाना तय है। कम से कम द्रमुक के दस फीसदी वोट रजनीकांत की पार्टी को जाएंगे। कमल भी अन्नाद्रमुक-विरोधी वोट हासिल करेंगे। विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा किए गए एक गंभीर अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामवार फैन क्लबों के चलते रजनीकांत को बढ़त हासिल है, जबकि कमल हसन के पास मजबूत संगठन का अभाव है।
तमिलनाडु में जब भी चुनाव होंगे, मुकाबला पांच कोणीय होगा। ये पांच कोण हैं-अन्नाद्रमुक (ईपीएस-ओपीएस), दिनाकरण, द्रमुक, कमल हासन और रजनीकांत। राज्य की राजनीति अस्थिर है। हालात बता रहे हैं कि चुनाव नतीजे आने के बाद राज्य में किसी एक पार्टी की सरकार नहीं बनेगी। निश्चित रूप से गठबंधन की सरकार बनेगी। जिस तरह पहले करुणानिधि और जयललिता के बीच सीधे मुकाबला होता था, वह जमाना चला गया। तमिलनाडु में बहुदलीय गठबंधन राजनीति के दिन आ गए हैं।
लेकिन इस पांच कोणीय मुकाबले में भी भाजपा एवं कांग्रेस के लिए कोई जगह फिलहाल नहीं दिखती। कांग्रेस जाहिर है, द्रमुक के साथ जाएगी, लेकिन सीटों के आवंटन से कांग्रेस कार्यकर्ता खुश नहीं होंगे। द्रमुक भारी सौदेबाजी करेगी, क्योंकि कांग्रेस का वोट बैंक न केवल कमल हासन की तरफ जा रहा है, बल्कि उसका मत प्रतिशत भी घट रहा है। पांच फीसदी वोट बैंक पर भाजपा की मजबूत पकड़ है, लेकिन इससे काम नहीं चलने वाला। कोई भी राजनीतिक संगठन भाजपा के साथ नहीं जाना चाहता, क्योंकि अल्पसंख्यक और ओबीसी वोटरों के बिदकने का डर है। तमिलनाडु के मतदाता काफी होशियार हैं, इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि वे निर्णायक फैसला देंगे।