भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने के मौके पर हम सबसे अहम बात को भूल गए हैं। हम उन जगहों को भूल गए, जहां इस सिनेमा को बनाया और संवारा गया यानी हमारे फिल्म स्टूडियोज।
'राजा हरिश्चंद्र' से शुरू करके देखें तो उस दौर की कई फिल्मों के कुछ हिस्से इनडोर शूट किए गए थे। उस वक्त बड़े आकार का कोई भी कमरा जहां शूटिंग की जा सके, फिल्म स्टूडियो कहा जा सकता था। धीरे-धीरे जब फिल्म निर्माण ने बड़े व्यवसाय का रूप लेना शुरू किया, तो फिल्म निर्माताओं ने भी बड़े-बड़े सपने देखने शुरू कर दिए।
इन बड़े सपनों में शामिल थे, कुछ ऐसे सुझाव और विचार, जिन्हें बाहरी स्थानों पर नहीं फिल्माया जा सकता था। इसके लिए निर्माताओं ने हर तरह की सुविधा से लैस फिल्म स्टूडियोज बनाने शुरू किए। इसकी शुरुआत दादा साहब फाल्के ने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी में बनाए गए 'नासिक फिल्म स्टूडियो' से की।
इसके बाद कोलकाता के टॉलीगंज में बी.एन.सरकार के 'न्यू थियेटर' के साथ सिनेमा का एक नया सफर शुरू हुआ। 'न्यू थियेटर' को हॉलीवुड स्टूडियो की तर्ज पर बनाया गया।
यहां फिल्म डेवलपमेंट लेबोरेटरी, साउंड रिकॉर्डिंग विभाग, इंजीनियरिंग यूनिट, कैमरा उपकरण रिपेयर वर्कशॉप, फिल्म कलाकारों के लिए रेस्ट रूम, कैंटीन सुविधाएं और एक रेफरेंस लाइब्रेरी तक की व्यवस्था की गई थी।
इस स्टूडियो की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि एक ऐसे व्यवसाय में होने के बावजूद भी जहां, मूल मालिक की मौत के साथ ही संस्था का पतन शुरू हो जाता है, यह स्टूडियो पूरे 84 साल तक बना रहा।
इसके अलावा मुंबई में भी फिल्म निर्माण के ऐसे कई केंद्र हैं, जो बीते वक्त की याद दिलाते हैं और अपनी खस्ता होती हालत की वजह से अफसोस करने पर भी मजबूर करते हैं।
'महबूब स्टूडियो' और 'आर.के.स्टूडियो' भी ग्लैमर और चकाचौंध से भरी इस फिल्मी दुनिया से जुड़े कुछ ऐसे ही नाम हैं। 'महबूब स्टूडियो' की जिम्मेदारी फिलहाल स्व. महबूब खान के बेटे देख रहे हैं।
इस स्टूडियो के पास खुद का एक बेहतरीन साउंड स्टेज है, जहां बड़े से बड़ा सेट बनाया जा सकता है। वहीं राज कपूर के 'आर. के स्टूडियो' की जिम्मेदारी रणधीर कपूर के हाथों में है, लेकिन यह स्टूडियो इस समय शायद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है।
इस फेहरिस्त में वी. शांताराम के 'राजकमल कला मंदिर' का नाम भी शामिल है। यहां फिलवक्त हिंदी फिल्में नहीं बनती हैं। इसके साउंड स्टूडियो को मराठी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों के निर्माण में जरूर इस्तेमाल किया जाता है।
इसके अलावा सोहराब मोदी का 'मूवीटोन' और 'बॉम्बे टॉकीज' जैसे कुछ और फिल्म स्टूडियोज हैं, जिन्हें बिलकुल भुला दिया गया है। सोहराब मोदी की मौत के बाद ही कर्जदारों ने मूवीटोन को हड़प लिया। यहां तक कि 'मिर्जा गालिब' फिल्म के लिए सोहराब मोदी को मिला उनका नेशनल अवॉर्ड मेडल भी कई साल बाद एक फिल्म प्रशंसक द्वारा मुंबई के चोर बाजार से वापस लाया गया।
वहीं हिमांशु राय और देविका रानी के 'बॉम्बे टॉकीज' के लिए वक्त काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा। जब अचानक हिमांशु राय की मौत हो गई तब स्व. अभिनेता अशोक कुमार ने इसकी पार्टनरशिप ली। लेकिन जब देविका रानी ने शादी के बाद बैंगलोर जाने के लिए मुंबई छोड़ा, तब इस स्टूडियो की किस्मत पर भी जैसे किसी ने सील लगा दी।
स्टूडियो का बिजनेस बुरी तरह गिर गया। आखिर में इस जगह को बिल्डरों को बेच दिया गया। इस सारे घटनाक्रम से सिर्फ यही सच्चाई सामने आती है कि यह जानने के बावजूद भी कि फिल्म स्टूडियोज जैसे निजी उद्योग हमारी शहरी संस्कृति का एक अहम हिस्सा हैं, हम उन्हें इस तरह नष्ट होते जाने के लिए छोड़ देते हैं।
सिनेमा के शताब्दी वर्ष के ऐसे समय में एक फिल्म प्रशंसक होने के नाते हम फिल्म स्टूडियो के खत्म होते जाने का विलाप करने के साथ ही यह उम्मीद भी कर सकते हैं कि जो स्टूडियो बचे हैं वह बने रहेंगे और प्रगति की एक नई और जरूरी पटकथा लिखेंगे।