इस मामला स्थिति गंभीर
उल्लेखनीय है कि अमेरिकी शॉर्टसेलर हिंडनबर्ग द्वारा करीब 22 महीने पहले लगाए गए आरोप कथित तौर पर शेयरों में हेराफेरी और गलत तरह से लेन-देन तक ही सीमित थे, साथ ही वह एक निजी फर्म भी थी। जबकि इस बार स्थितियां अलग हैं। उन पर आरोप है कि 2021 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री से अदाणी की मुलाकात के बाद राज्य सरकार उनसे बिजली खरीदने के लिए सहमत हुई, जिसके लिए प्रदेश के अधिकारियों को तो भारी रिश्वत दी ही गई, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर में भी कुछ इसी तरह से बिजली खरीदी गई, जिससे अंदर की व्यवस्थाओं के काम करने के तरीके का ही पता चलता है।
भारतीय बाजार पर असर स्वभाविक
अदाणी देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से हैं, और वह अगर घेरे में हैं, तो इसका असर बाजार पर पड़ना तय ही है। अमेरिकी अदालत में अभियोग दायर होने के बाद केन्या सरकार ने अदाणी समूह के साथ दो बड़ी परियोजनाओं का सौदा रद्द कर दिया, तो घरेलू बाजार में भी कंपनी के शेयर तेजी से गिरे हैं।
अभियोग से आरोप तक
दरअसल, ऐसे मामलों में सबसे बुरी बात यह होती है कि इनसे निवेशकों का बाजार पर से भरोसा टूटता है, जो समग्र अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। हालांकि अमेरिकी न्याय विभाग के बयान में भी कहा गया है कि अभियोग केवल आरोप हैं, जो जब तक सिद्ध नहीं होते, तब तक प्रतिवादियों को निर्दोष ही माना जाएगा।
एक नजर राजनीतिक मोड़ पर भी..
अच्छा गौर करने वाली बात है कि जिन राज्यों के ये मामले हैं, उनमें गैर-भाजपा सरकारें ही थीं, लेकिन इसके बावजूद विपक्ष जिस तरह से हमलावर है और सियासत गर्माई हुई है, उससे 25 नवंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र के पूरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। अदाणी समूह निश्चित ही उच्च अदालतों में अपील करेगा और उपलब्ध कानूनी विकल्पों को खंगालेगा। इसके पीछे आर्थिक प्रतिस्पर्धा हो या कुछ और। सवाल उठे हैं, तो निष्पक्ष जांच के जरिये सच सामने आना ही चाहिए।