गर्मी बढ़ रही है और धरती तप रही है। लू के थपेड़े हमें घरों में कैद होने को विवश कर रहे हैं। यह जानलेवा गर्मी गरीबों के लिए सबसे ज्यादा कष्टदायी है, क्योंकि उन्हें तो काम के लिए हर हाल में घर से बाहर निकलना ही है। उनके सुस्ताने के लिए बाग-बगीचे नहीं रहे। पशु-पक्षी की परवाह हम कम ही करते रहे हैं, अब मनुष्य की भी परवाह नहीं करते। रोज बढ़ रही गर्मी से बचने का कोई उपाय भी हमारी चिंता में नहीं है।
नदी-नाले सूख रहे हैं। हवा की तपन को नियंत्रित करने वाले बड़े़-बड़े बाग-बगीचे और झाड़ियों को हमने निर्दयतापूर्वक समाप्त कर दिया है। ताल-तलैयों के प्रति जो नीति रही, उससे अब न गांवों में बारहों महीने पानी वाले तालाब बचे हैं और न झीलें बची हैं। शहरों में सीमेंट के जो जंगल खड़े किए गए, उसने हरियाली खत्म कर दी। बड़े-बड़े कॉलोनाइजरों ने बेरहमी से बागों, तालाबों और झीलों को खत्म किया।