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समस्या: शहर-शहर कचरे के पहाड़, बड़ी चुनौती है कूड़ा-करकट का प्रबंधन

ज्ञानेंद्र रावत
Updated Fri, 26 Apr 2024 07:17 AM IST

सार

कचरे के पहाड़ की समस्या सिर्फ राजधानी दिल्ली या मुंबई महानगर तक सीमित नहीं है, बल्कि अब तो गुरुग्राम ने भी इस सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया है। यहां बंधवाड़ी लैंडफिल साइट पर रोजाना फरीदाबाद और गुरुग्राम का 2,300 टन कचरा पहुंच रहा है और अक्सर आग लगने की घटनाएं होती हैं।
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Ghazipur Landfill Fire - फोटो : अमर उजाला


कचरे के पहाड़ की समस्या सिर्फ राजधानी दिल्ली या मुंबई महानगर तक सीमित नहीं है, बल्कि अब तो गुरुग्राम ने भी इस सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया है। यहां बंधवाड़ी लैंडफिल साइट पर रोजाना फरीदाबाद और गुरुग्राम का 2,300 टन कचरा पहुंच रहा है और अक्सर आग लगने की घटनाएं होती हैं। यहां फिलहाल तकरीबन 16 लाख टन कूडा पड़ा है। बीते 24 दिनों में यहां 13 बार आग लगने की घटनाएं हुई हैं। लैंडफिल साइट के पास लोगों का रहना काफी मुश्किल होता जा रहा है, लेकिन लोग खून-पसीने की कमाई से अर्जित मकान छोड़ नहीं पा रहे हैं। यहां रहने वाले लोग बरसों से दिल, सांस, गले में खराश, दिमाग में सूजन आदि विभिन्न रोगों के चंगुल में हैं। खासतौर पर बच्चों, गर्भवती महिलाओं, हृदय और सांस के रोगियों के लिए यह स्थिति जानलेवा है।


दिल्ली में कचरे के पहाड़ में लगी आग से शहर में घुल रहे धुंए पर न केवल उपराज्यपाल, बल्कि दिल्ली के पर्यावरण मंत्री और सुप्रीम कोर्ट तक ने संज्ञान लेते हुए निगमायुक्त, प्रमुख सचिव व दिल्ली सरकार से जबाव मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह आश्चर्यजनक है कि राजधानी में प्रतिदिन निकलने वाले 11,000 टन ठोस कचरे में से 3,000 टन का उचित तरीके से निपटान नहीं किया जाता है। हैरानी की बात है कि ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2016 को लागू हुए आठ साल हो गए हैं, लेकिन दिल्ली में इसका कोई पालन नहीं हो रहा है। नतीजतन कचरे का पहाड़ दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाता है।


पूरे देश में हर साल 277 अरब किलो कचरा निकलता है, यानी प्रति व्यक्ति करीब 205 किलो कचरा निकलता है। इसमें से केवल 70 फीसदी ही इकट्ठा किया जाता है। बाकी जमीन और पानी में फैला रहता है। इकट्ठा किए गए कचरे में से आधा या तो खुले में फेंक दिया जाता है या उसे जमीन में दबा दिया जाता है। औद्योगिक कचरे के निपटान की जिम्मेदारी उद्योगों पर और घरों से निकले कचरे के निपटान की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती है। देश में कुल कचरे में से सिर्फ पांचवें हिस्से की रिसाइक्लिंग हो पाती है।


खुले में फेंके कचरे में भारी मात्रा में निकल, जिंक, आर्सेनिक, कांच, क्रोमियम और दूसरी जहरीली धातुएं होती हैं, जो पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे की वजह होती हैं। देश में सालाना जितनी जहरीली मीथेन उत्सर्जित होती है, उसमें से 20 फीसदी सिर्फ इन कचरे के ढेरों से निकलती है। अब छोटे शहर-कस्बों में भी में कचरे के लैंडफिलों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। आने वाले दिनों में विकास की रफ्तार और बढे़गी, ऐसे में कई गुना कचरा बढ़ेगा। हमारे देश में अहमदाबाद, सूरत, नवी मुंबई, मैसूर और इंदौर ने कचरा संग्रह और उसके निपटान व स्वच्छता में अपनी  विशिष्ट पहचान बनाई है, जिनसे कुछ सीख ली जा सकती है। कचरा प्रबंधन के मामले में हम दूसरे देशों से बहुत पीछे हैं। विश्व बैंक के अनुसार, 2030 तक भारत में हर साल निकलने वाला कचरा 388 अरब किलो हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि लोगों को घरों में ही अलग-अलग डस्टबिन में कचरा रखने के लिए जागरूक किया जाए, ताकि उसे रिसाइकल करने में आसानी हो। वैसे स्वच्छ भारत अभियान से स्थिति थोड़ी सुधरी जरूर है, पर अभी काफी कुछ करना बाकी है।
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