वे दोनों खुश तो थे, मगर उतने ही हैरान भी थे! दोनों के साथ हादसा हुआ था। दोनों का दर्द एक जैसा था, इसलिए अपना-अपना दर्द बांटने लगे, भई, मान गए अंग्रेजों को। हमें कहां पता था कि पर्यावरण के बारे में हम इतना जानते हैं। पर इन अंग्रेजों को यह कैसे पता लगा कि पर्यावरण में हम भी दखल रखते हैं?
फोकट की बातों में अपना इंटरेस्ट कभी नहीं रहा। जमीन में अपनी दिलचस्पी जरूर है। जहां पौधे लगाने बुलाया, वहां भी यही देखा कि जमीन के भाव कैसे हैं। और तुम तो कभी ऐसे पचड़ों में पड़े भी नहीं। इसीलिए कह रहा हूं कि यह विरोधियों की चाल है। इतने विधायकों में सिर्फ हम दो ही क्यों पसंद आए?
मुझे भी हैरत हो रही है। कहा था मुख्यमंत्री से कि हमें भी विदेश घुमवा दो। जब सिंगापुर और थाईलैंड का दौरा था, तो दूसरों को साथ ले गए थे। अब यहां हम दोनों को इकल्ला भेज दिया है। तुम तो फिर भी टूटी-फूटी अंग्रेजी समझ लेते हो, अपना हाथ तो शुरू से ही अंग्रेजी में तंग रहा है। पर्यावरण कितना ही हरा-भरा हो, मगर विषय तो एकदम सूखा है न!
मेरा लास-वेगास जाने का मन था, तो सीएम ने लंदन भेज दिया! ऊपर से भाषण भी दो।
मंत्रिमंडल में फेरबदल हो रहा है क्या? इसी बहाने दो उम्मीदवार कम कर दिए। दूसरे ने शक जताया।
तुम्हारा नाम हो सकता है। मेरा कोई चांस ही नहीं है। इतने घोटाले हैं अपने नाम पर! और कोई वजह होगी। पहले ने कहा!
कुछ भी हो। यह यात्रा तो गले पड़ गई लगती है। जितने दिन विदेश में रहोगे, खटका लगा रहेगा कि पीठ पीछे गुल-गपाड़ा तो नहीं हो गया। इसीलिए कहा था सीएम से कि आपके साथ जाना है!
तो तुम क्या बोलोगे पर्यावरण पर? पहले ने पूछा।
वही, जो अफसरों ने लिखकर दिया है! दूसरे ने बताया।
हां, मुझे भी अंग्रेजी का भाषण हिंदी में लिखकर दिया है। घूमने से बड़ा टेंशन तो बोलने का हो रहा है। बस, यह निपट जाए, तो गंगा नहाएं! दोनों ने यों राहत की सांस ली, जैसे सही में गंगा नहा लिए हों।