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नक्सलवाद: निर्णायक मोड़ पर... एक ऐसा अभियान जिसके प्रति प्रतिबद्ध रहा सत्ता प्रतिष्ठान

अमर उजाला Published by: लव गौर Updated Sat, 27 Dec 2025 06:58 AM IST

सार

69 वर्षीय गणेश उइके कोई साधारण माओवादी नहीं था, वह तेलंगाना के नलगोंडा जिले का निवासी था और चार दशकों से भी अधिक समय से भूमिगत जीवन जी रहा था। उस पर एक करोड़ रुपये से भी ज्यादा का इनाम घोषित था और अगर उसकी मौत को राज्य में नक्सलवाद की कमर तोड़ने वाला झटका बताया जा रहा है, तो इसकी वजह भी है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


2025 में अब तक नक्सली प्रमुख बसव राजू समेत केंद्रीय समिति के तकरीबन सभी शीर्ष माओवादी (दो को छोड़कर) या तो मारे जा चुके हैं या फिर आत्मसमर्पण कर चुके हैं। जाहिर है कि देश नक्सलवाद से मुक्ति पाने की दिशा में अग्रसर है और इस राह में 2025 एक बड़ी कामयाबी साबित हुआ है। इस दौरान, शीर्ष कमांडरों समेत 317 नक्सलियों को मार गिराया गया। 800 से अधिक नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 2,000 ने आत्मसमर्पण कर दिया। यह उपलब्धि ही कही जाएगी कि 2025 के अंत तक, देश में नक्सलवाद से प्रभावित जिलों की संख्या घटकर केवल 11 रह गई है, जबकि 2014 में यह आंकड़ा 126 था।


खास बात यह है कि सरकार द्वारा मार्च, 2026 तक देश से नक्सलवाद के सफाए के इरादे जाहिर करने के बावजूद यह भी सुनिश्चित किया गया है कि उनसे मुक्त हुए क्षेत्रों तक विकास की निर्बाध पहुंच हो सके। आंकड़े अपनी कहानी आप कहते हैं। 2014 से अब तक, केंद्र सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में करीब 12,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है, जबकि करीब 17,589 किलोमीटर की परियोजनाओं को 20,815 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी गई है।


यह सही है कि माओवाद की जड़ें गरीबी, शोषण और आदिवासियों के असंतोष में छिपी हैं, लेकिन हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकता। दशकों से माओवादी सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों पर हमले और विकास कार्यों को बाधित भी करते रहे हैं। माड़वी हिड़मा, बसव राजू और गणेश उइके जैसे नक्सली कमांडरों ने हिंसा को संगठित रूप दिया और अब, जबकि उनका अंत हो रहा है, तो यह संदेश स्पष्ट है कि हिंसा का रास्ता लोकतंत्र में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता।
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