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गांधी जयंती: जापान की कात्सू सान सर्वधर्म प्रार्थना सभा का चेहरा, 1956 में भारत आईं; राजघाट पर 50 साल से...

विवेक शुक्ला Published by: शिवम गर्ग Updated Thu, 02 Oct 2025 06:58 AM IST

सार

जापानी मूल की कात्सू बहन, जो 1956 में भारत आई थीं, गांधी से इतनी प्रभावित हुईं कि पिछले पचास वर्षों से राजघाट पर होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का चेहरा बनी हुई हैं।
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गांधी जयंती - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी


गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को लेकर उनकी निष्ठा निर्विवाद है। कात्सू सान के नेतृत्व में ही सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं में हिंदू, इस्लाम, पारसी, सिख, बौद्ध, बहाई, यहूदी धर्मों के ग्रंथों से पाठ होता है। उन्हें कोई कात्सू मां, तो कोई कात्सू बहन कहता है। वह मूलत: जापानी हैं, जो 1956 में भारत आई थीं, ताकि गहराई से भगवान बुद्ध को जान सकें। यहां आने पर उनका गांधीवाद से भी साक्षात्कार हो गया। फिर तो उन्होंने भारत में ही बसने का निर्णय ले लिया। उनके प्रयासों से ही राजधानी में विश्व शांति स्तूप स्थापित हुआ। वह धारा प्रवाह हिंदी बोलती हैं। मुस्कान उनके चेहरे का स्थायी भाव है। वह विश्व बंधुत्व, प्रेम और शांति का संदेश लेकर भारत के गांवों, कस्बों, शहरों और महानगरों में घूमती हैं। उन्हें भारत के कण-कण में पवित्रता दिखाई देती है। वह भारत को संसार का आध्यात्मिक विश्व गुरु मानती हैं।


उनके मुताबिक, भगवान बुद्ध और गांधी जी के रास्ते एक तरफ ही लेकर जाते हैं। दोनों सदैव प्रासंगिक रहने वाले हैं। वह कहती हैं, 'मुझे दुनिया में कोई अन्य देश नहीं मिला, जहां पर सरकारी कार्यक्रमों में सर्वधर्म प्रार्थना सभा आयोजित होती हो। यहां पर सभी धर्मों का सम्मान होता है।' तमाम गांधीवादी कामना करते हैं कि कात्सू सान शीघ्र स्वस्थ हो जाएं। उनकी मौजूदगी में सर्वधर्म प्रार्थना सभा में भाग लेने का आनंद दोगुना हो जाता है। गांधी जी के जीवनकाल में ही आरंभ हुई सर्वधर्म प्रार्थना सभा आज भी आयोजित की जाती हैं।


सर्वधर्म प्रार्थना का विचार वास्तव में बहुत बड़ा और व्यापक है। यह एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि भारत में सभी धर्मों को मानने वाले एकसाथ बैठकर अपने धर्मग्रंथों के मुख्य बिंदुओं को रख सकते हैं। महात्मा गांधी ने सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का सबसे पहले आयोजन राजधानी के वाल्मीकि मंदिर में शुरू किया था। तब देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। गांधी जी की चाहत थी कि इस पहल से विभिन्न धर्मों के अनुयायी एक-दूसरे के धर्मों और उनकी शिक्षाओं को जान लेंगे। वे वाल्मीकि मंदिर में एक अप्रैल, 1946 से 10 जून, 1947 तक रहे थे। बाद में वह बिड़ला मंदिर शिफ्ट हुए, तो भी सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं जारी रहीं।


सर्वधर्म प्रार्थना सभा विश्व कल्याण और संसार के सभी प्राणियों की सुख-समृद्धि से संबंधित है। आशा की जानी चाहिए कि कात्सू सान आगामी 30 जनवरी को गांधी जी के बलिदान दिवस पर होने वाली प्रार्थना सभा में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाएंगी।

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