पता नहीं, अंग्रेजों का एजेंट बता देने का असर था या कुछ और, एक रात बापू मेरे सपने में आ गए। वह उसी धोती में थे, जिसकी तस्वीर हमने बचपन से देखी है। मैं उनको देखता रहा, तो वह बोले, देख लो। मैं हमेशा इन्हीं कपड़ों में रहा। जिंदगी भर मैं अंग्रेजों से लड़ता रहा। पर आज मुझे अंग्रेजों का एजेंट बताया जा रहा है। यह सुनकर बहुत दुख होता है। अगर मुझे पता होता कि एक दिन मुझे उन्हीं का एजेंट कहा जाएगा, तो भगाने के बजाय अंग्रेजों से कहता कि इस देश पर अगले सौ वर्षों तक और राज करो।
पर बापू, लोग तो कह रहे हैं कि विभाजन आप ही ने करवाया था, मैंने उनसे डरते-डरते पूछा।
वह फूट पड़े, मैंने तो इस टूटे-फूटे ‘भानुमती के कुनबे’ में एकरसता लाने का प्रयास किया था। मैं नेहरू और जिन्ना को एक साथ देखना चाहता था। हिंसा रोकने के लिए मैंने क्या नहीं किया? विभाजन मैं नहीं रोक पाया, इसका यह अर्थ कैसे हुआ कि मैंने विभाजन कराया?
बापू, कुछ लोग अब गोडसे का मंदिर बनाने की मांग कर रहे हैं। क्या आपको दुख नहीं हुआ यह सुनकर?
उनके चेहरे पर उदासी थी। फिर भी वह थोड़ा रुककर बोले, गोडसे का मंदिर बनाने में क्या बुराई है? मैंने तो मरकर भी किसी का बुरा नहीं चाहा। मैं तो ईसा मसीह जैसा क्षमाशील बनना चाहता हूं। ईश्वर आप सब को सद्बुद्धि प्रदान करे।
फिर भी हम लोग आपको भूलने लगे हैं। सिर्फ दो अक्तूबर को ही आपकी याद आती है, मैंने माफी मांगने वाले अंदाज में उनसे कहा।
झूठ बोलते हो तुम। वह उबल पड़े, सरकार ने नोटों पर मेरी तस्वीर लगा रखी है। इसलिए नोट गिनने वाले मुझे देखते ही रहते हैं, भले वे मुझे याद करना चाहें या न चाहें। तब मेरा कलेजा कट जाता है, जब गुंडे तक धमकाते हुए कहते हैं, दो पेटी हरा वाला गांधी लेकर आना। अपने देश में यह बेइज्जती सही नहीं जाती। सरकार से बोलो, मुझे राष्ट्रपिता कहना बंद करे। सरकारी दफ्तरों से मेरी तस्वीर हटा ले।