इस तरह का जब कोई बड़ा आयोजन होता है, तो मेजबान देश के पास दुनिया को अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिलता है। भारत न केवल आर्थिक मामलों में तेजी से प्रगति कर रहा है, बल्कि बुनियादी ढांचों के मामलों में काफी विकास कर रहा है। इस अवसर पर हम सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक क्षमता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक क्षमता का भी प्रदर्शन कर सकते हैं। विकसित देशों के अलावा ग्लोबल साउथ के जो देश इस अवसर पर भारत आएंगे, वे भी यह देखकर प्रेरित होंगे कि भारत जैसा बड़ी जनसंख्या वाला विकासशील देश, जो उन्हीं की तरह मुश्किलों से उबर कर आगे आया है, आज किस तरह वैश्विक मंच पर विकसित देशों से होड़ ले रहा है। इससे विकसित देशों में आगे निवेश में ज्यादा मदद मिल सकती है। दूसरा, इससे बाकी देशों में बाजार भी मिल सकता है। भारत जिस तरह से आत्मनिर्भरता पर और नई तकनीक के विकास पर जोर दे रहा है, निवेश के लिए दूसरे देशों को आमंत्रित कर रहा है, उसमें भी फायदा मिलेगा। चीन को लेकर कई देशों में थोड़ी बहुत नकारात्मकता जिस तरह फैली है, उसका लाभ भी भारत जी-20 की बैठक से उठा सकता है।
जी-20 की अध्यक्षता बीस वर्षों के अंतराल पर मिलती है। इससे पहले 2003 में भी भारत ने जी-20 की अध्यक्षता की थी। कई मायनों में तो 2003 और अब का समय भारत के लिए एक-सा ही नजर आता है। उस समय 'शाइनिंग इंडिया' का अभियान चल रहा था और भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक भागीदारी की तैयारी कर रहा था, जबकि उससे पहले अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी देशों ने हमारे परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं, जो हटाई जा रही थीं। हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही थी और अगले वर्ष (2004 में) होने वाले लोकसभा चुनाव की सरगर्मी भी शुरू हो गई थी। कमोबेश ऐसी ही स्थिति आज भी है। कुछ समय पहले कोविड के कारण भारत समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को झटका लगा था, जिससे भारत तेजी से ऊबर गया है और हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है।
हां, अंतर यह है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत का कद पहले से ज्यादा बढ़ा है। कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन डिप्लोमैसी के जरिये भारत ने पूरे विश्व में, खासकर अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अपने पड़ोसी देशों के साथ सद्भावना अर्जित की, जो अच्छी बात है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना कद बढ़ाने की शुरुआत 2003 में ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर उसके लिए इतने ज्यादा कदम नहीं उठाए गए थे। दिसंबर, 2003 में सुनामी आने पर भारत ने प्रभावित देशों की मदद शुरू की थी। कोविड के समय भी दूसरे देशों की भारत ने काफी मदद की। हाल के दिनों में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने जिस तरह से कामयाबी हासिल की है, उससे भी दुनिया भर में भारत की क्षमता का लोहा माना जाने लगा है।
भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिग कराने वाला पहला देश बन गया है। अभी भारत ने आदित्य एल-1 लॉन्च किया है। इसके अलावा, भारत ने सोलर एलायंस के मुख्यालय के लिए पांच एकड़ जमीन दी है। कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए निर्धारित लक्ष्य की दिशा में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये सब नई चीजें हैं। कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था काफी लड़खड़ा गई है। कुछ देश पहले ही मंदी में फंस गए हैं और कुछ मंदी के कगार पर हैं। अमेरिका की स्थिति यूरोप से बेहतर है, लेकिन वहां भी काफी मुश्किलें हैं। चीन की स्थिति कुछ ज्यादा ही डावांडोल नजर आ रही है। एक तो कोविड के बाद हाल ही में उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से खोला है, इसलिए अब भी वह पूरी तरह से महामारी के असर से उबर नहीं पाया है। अमेरिका और चीन के रिश्तों को लेकर भी अनिश्चितता बरकरार है।
इस अनिश्चितता की वजह से दोबारा से वैसी स्थिति पैदा हो गई, जैसी 2008 में हुई थी। जी-20 का गठन ही वैश्विक अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए किया गया था। दुनिया भर में आर्थिक उथल-पुथल है, मंदी का खतरा मंडरा रहा है। यूक्रेन युद्ध की वजह से ग्लोबल साउथ में तो खाने-पीने की दिक्कत पैदा हो रही है। कच्चे माल, उर्वरक और अन्य वस्तुओं की तंगी हो गई है। इन सब चीजों के चलते जी-20 की प्रासंगिकता फिर से बढ़ गई है और महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी जी-20 की अध्यक्षता हमारा देश कर रहा है।
इस बैठक में दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष नई दिल्ली पहुंच रहे हैं, लेकिन रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत नहीं आ रहे हैं। इसको लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। पुतिन चूंकि यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसे हैं, इसलिए वह नहीं आ रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री से बात भी की है। जहां तक शी जिनपिंग का सवाल है, वह अब तक सभी जी-20 की मीटिंग में भाग लेते रहे हैं। जी-20 बैठकों में वह स्टार प्लेयर हुआ करते थे, क्योंकि सभी देशों को लगता था कि चीन दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग हब है। सभी देश चीन के नेताओं से बात करना चाहते थे, लेकिन अब वैसी बात रही नहीं है। इसके अलावा घरेलू स्तर भी वह संभवतः फंसे हुए हैं। हो सकता है कि यूक्रेन युद्ध को लेकर दोनों नेता आलोचनाओं से बचने के लिए न आ रहे हों। चीन चूंकि हमारा पड़ोसी देश है, उसके साथ हमारा व्यापारिक संबंध भी है, इसलिए वह आते तो द्विपक्षीय वार्ता भी हो सकती थी। लेकिन वह नहीं आ रहे, तो भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है। हमारे विदेश मंत्री ने ठीक ही कहा है कि जी-20 शिखर सम्मेलन में कौन शामिल हो रहा है और कौन नहीं, इसके बजाय ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
बहरहाल, यह हमारे लिए एक बड़ा अवसर है, जब हम दुनिया भर के नेताओं को अपनी अनूठी संस्कृति, वेशभूषा, परिधान, अपनी आर्थिक और औद्योगिक क्षमता से परिचय करा सकते हैं और भविष्य में निवेश के लिए प्रेरित कर सकते हैं।