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कविता के अच्छे दिन कब आएंगे

Sun, 10 Aug 2014 06:22 PM IST
श्याम विमल
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आज कविता के साथ क्या हो रहा है, कवि मित्रो, जरा सोचिए! यहां कविता का मतलब कविता नाम की साहित्यिक विधा से है, कविता नाम की लड़की या महिला से नहीं। लेखक मित्रों को याद होगा कि इस भारत भूमि पर कभी संस्कृत का युग गुंजायमान हुआ करता था-बहुत संवेदनशील था वह युग। उस समय एक व्याध ने परस्पर कल्लोल करते हुए मिथुनरत क्रोंच जोड़े में से नर पक्षी का बाण से वध किया था, तो विरहिणी पक्षिणी का क्रंदन सुन ऋषि वाल्मीकि के अंतस से श्लोक रूप में पहली कविता का जन्म हुआ था।
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सुमित्रानंदन पंत ने उसका सुंदर अनुवाद किया था-वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। बाद में बालकृष्ण शर्मा नवीन ने क्रोध में कहा-कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए। ऐसे ही स्वदेश की बदतर हालत से क्रुद्ध होकर कविवर नागार्जुन ने कह डाला, प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का।

कविता उम्र की मोहताज नहीं होती। चार सप्तकों के संपादक कवि अज्ञेय के भीतर तो महज चार साल की उम्र में ही कविता का एहसास जागा था, जब लकड़ी की रंगीन भंभीरी (लट्टू) को घूमता देख वह ताली बजाते गा उठे थे-नाचत है भूमिरी...। इसी पंक्ति को उन्होंने अपनी पहली कविता माना था।
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परंतु आज ई-बुक्स की अद्यतन तकनीक के रहते विमर्शकारी संगोष्ठियों या कवि सम्मेलनों में लोक रुझान के साबित होने के बावजूद वंचित कवि-मित्रों की कविताओं को पुस्तकाकार देने से हिंदी के नामी-गिरामी प्रकाशक जन न बिकने का रोना लेकर नाक-भौंह सिकोड़ लेते हैं। वे कहते हैं, कविता की किताब बिकती ही नहीं, हम क्यों छापें? ऐसे में मायूस कवि अपनी पांडुलिपि संभालकर रख देता है।

बड़े लोग कहीं ऐसा तो नहीं सोचते कि वक्त के अतीत में दफन हो जाने दो कविता को। बाद में इसके अच्छे दिनों में वक्त की खुदाई कर ली जाएगी। तब जीवाश्म का रूप ले चुकी कविता का एंटीक वस्तु जैसा सौदा कर लिया जाएगा। बड़ा फायदेमंद होगा वह काव्यप्रकाश!
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