पाकिस्तान पर शासन करने वाले किसी सैन्य जनरल की पद त्यागने के बाद सत्ता में वापसी नहीं हो पाई है, लेकिन सैन्य पृष्ठभूमि से ताल्लुक न रखने वाले शासकों को यह उपलब्धि हासिल हुई है, जैसे कि नवाज शरीफ का तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना। दूसरी तरफ जनरल मुशर्रफ हैं, जो वैसे तो अपने देश का इतिहास बदलना चाहते थे, लेकिन सेनाध्यक्ष से राष्ट्रपति बनने के बाद अब संगीन आरोपों के साथ जेल में बंद होकर वह दूसरी तरह से इतिहास बना रहे हैं। चार वर्ष का निर्वासन झेलने के बाद मुशर्रफ ने देश का नेतृत्व करने और उसे बचाने की मुहिम के साथ वतन वापसी की थी। लेकिन अब वह उसी अदालत के सामने खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं, जिसके न्यायाधीशों को कारागार में डालकर कभी उन्होंने बर्खास्त कर दिया था। इतिहास की कोई भी करवट इतनी ज्यादा घातक और दर्दनाक नहीं हो सकती, जितनी मुशर्रफ के मामले में देखने को मिल रही है। विडंबना तो यह है कि सेनाध्यक्ष परवेज कियानी समेत कई चुनींदा सेनाधिकारी भी उन मुशर्रफ को बचाने की कोशिश नहीं कर रहे, जो चालीस वर्षों से उनके साथ रहे हैं और बारह वर्षों तक उनका नेतृत्व किया है।
विगत 20 अगस्त से ही मुशर्रफ के बुरे दिनों की शुरुआत हो चुकी है, जब पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में न केवल एक अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी हेराल्डो मुनोज ने भी बेनजीर हत्याकांड में सीधे-सीधे उन पर उंगली उठाई है। संयुक्त राष्ट्र की यह जांच बेनजीर के पति व निवर्तमान राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के आग्रह और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून के निर्देश पर शुरू हुई थी।
दरअसल संयुक्त राष्ट्र के जिस तीन सदस्यीय आयोग ने बेनजीर हत्याकांड की जांच शुरू की थी, उसके प्रमुख हेराल्डो मुनोज ने इस समूचे घटनाक्रम पर एक किताब लिखी है, जिसका नाम है, गेटिंग अवे विद द मर्डर...। उस आयोग ने जुलाई, 2009 में काम करना शुरू किया था और बगैर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे मार्च, 2010 में काम बंद भी कर दिया। लेकिन मुनोज ने इस मामले की खोजबीन जारी रखी। इसी का नतीजा यह किताब है, जो बेनजीर हत्याकांड की तह में जाती है। मुनोज ने मुशर्रफ के प्रमुख अधिकारियों पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि उन्होंने सेनाध्यक्ष के निर्देशों के अनुरूप काम किया। उन्होंने ये आरोप भी लगाए कि अक्तूबर, 2007 में जिस समझौते के तहत बेनजीर निर्वासन से लौटी थीं, उसके विफल हो जाने के बाद उनके सुरक्षा बंदोबस्त में मुशर्रफ ने लापरवाही दिखाई।
बेनजीर की हत्या में सेना की खुफिया इकाई आईएसआई की भूमिका से भी मुनोज इनकार नहीं करते। पाकिस्तान में जीवन के विविध क्षेत्रों में आईएसआई और दूसरी खुफिया एजेंसियों की व्यापक पहुंच, हिंसक वारदातों को अंजाम देने वाले इस्लामी समूहों के साथ उसके संबंध, पिछले चुनाव में उसकी भूमिका और आतंकवादियों, पत्रकारों, राजनेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं पर उसकी पैनी नजर को देखते हुए पाकिस्तानी समाज और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह धारणा मजबूत हुई है कि बेनजीर की हत्या में आईएसआई किसी न किसी मोड़ पर तो जरूर लिप्त रही होगी। मुनोज लिखते हैं कि निर्वासन के बाद पाकिस्तान लौटने से पहले बेनजीर भुट्टो से मुशर्रफ ने कहा था कि वह उनको सुरक्षा तभी देंगे, जब वह उनके साथ ठीक बनी रहें। मुनोज की यह किताब फॉरेन अफेयर्स मैगजीन की वेबसाइट पर छप चुकी है।
दरअसल अब यह आम राय बन रही है कि बेनजीर के सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी कर मुशर्रफ ने उनके हत्यारों के लिए रास्ता आसान कर दिया। लेकिन इसकी नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी से उन्हें बरी नहीं किया जा सकता।
बेनजीर हत्याकांड पर यह खुलासा तब हुआ है, जब एंटी टेररिज्म कोर्ट में मुशर्रफ के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया गया है। अब तक जो सुबूत मिले हैं, उनके आधार पर बेनजीर की हत्या प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने भी कराई हो सकती है। इसके संस्थापक और पूर्व प्रमुख बैतुल्लाह महसूद ने इसका जोरदार खंडन किया था, बाद में अमेरिकी ड्रोन हमलों में वह मारा गया। लेकिन कियानी ने दबी जुबान में स्वीकार किया है कि बेनजीर की हत्या के पीछे टीटीपी का हाथ था।
ऐसा महसूस होता है कि बेनजीर की हत्या के लिए अल-कायदा ने निर्देश जारी किया, पाकिस्तानी तालिबान ने इस हमले को अंजाम दिया और सरकारी तंत्र इसमें सहायक बना। मुशर्रफ सरकार सब कुछ जानते हुए भी आंखे बंद किए रही, स्थानीय पुलिस ने सुबूतों को खत्म करने की कोशिश की और बेनजीर की निजी सुरक्षा टीम उन्हें बचाने में नाकामयाब रही। लेकिन क्या अब भी कुछ होगा? बेनजीर की हत्या के बाद सुबूतों के साथ हुई छेड़छाड़ में खुफिया अधिकारियों की मिलीभगत को लेकर जिस तरह दबी जुबान में आशंकाएं जताई जा रही हैं, उन पर भी दुनिया भर की नजर है।
पाकिस्तान सरकार और वहां की अदालतों में क्षमता और इच्छाशक्ति की जैसी कमी है, उसे देखते हुए बेनजीर हत्याकांड की गुत्थी अगर अनसुलझी भी रह जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह निर्विवाद तथ्य है कि पाकिस्तान के राजनीतिक हलके ने हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों की खोजबीन में कोई रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में बेनजीर हत्याकांड का सच पूरी तरह भले सामने न आए, लेकिन यह तो साफ ही है कि उसमें मुशर्रफ की भूमिका थी।