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सत्रहवीं लोकसभा का भविष्य : लंबे समय से सदन का चेहरा बने कई बड़े नेता इस बार नहीं होंगे

अवधेश कुमार Published by: Raman Singh Updated Tue, 18 Jun 2019 02:12 AM IST
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Loksabha - फोटो : a

सत्रहवीं लोकसभा का सत्र आरंभ हो गया है। सोलहवीं लोकसभा से एकदम आमूल अंतर तो नहीं आया है, पर इस बार तस्वीर थोड़ी अलग होगी। हो सकता है कि इस बार लोकसभा का चित्र थोड़ा भिन्न हो। सोलहवीं लोकसभा के अंतिम दो वर्षों में राजनीति इतनी हावी हो गई थी कि अनेक महत्व के मसले बहस से वंचित रह गए।

सबसे पहले सत्रहवीं लोकसभा की अंतःरचना को समझते हैं। इस बार आधे से अधिक यानी 277 सांसद पहली बार संसद पहुंचे हैं। इसमें भाजपा अध्यक्ष व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हैं। इस बार लोकसभा में सांसदों की औसत उम्र 54 साल है। इनमें 25 से 40 वर्ष की उम्र के करीब 12 प्रतिशत सांसद हैं। 40 से 55 साल के करीब 41 प्रतिशत सांसद हैं। 56 से 70 साल के 42 प्रतिशत सांसद लोकसभा पहुंचे हैं। 70 साल से अधिक उम्र के केवल छह प्रतिशत सांसद ही हैं। इस बार लोकसभा में महिला सांसदों की कुल संख्या 78 है। इसलिए हो सकता है महिला आरक्षण का मामला इस बार सबसे ज्यादा गरमाए।



इस बार स्नातक तक पढ़े 394 लोग संसद पहुंचे हैं। 39 प्रतिशत सांसदों ने स्वयं को राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता बताया है। यानी प्रोफेशनल राजनीति के दौर में ये पूर्णकालिक राजनीतिक लोग हैं। हालांकि लंबे समय से लोकसभा का चेहरा बने कई बड़े नेता इस बार नहीं होंगे, जिनमें भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुमित्रा महाजन, सुषमा स्वराज, हुकुमदेव नारायण यादव, पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा आदि शामिल हैं। ये सारी स्थितियां लोकसभा की कार्यवाही पर असर डालेंगी।

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Loksabha - फोटो : a
सत्रहवीं लोकसभा का सत्र आरंभ हो गया है। सोलहवीं लोकसभा से एकदम आमूल अंतर तो नहीं आया है, पर इस बार तस्वीर थोड़ी अलग होगी। हो सकता है कि इस बार लोकसभा का चित्र थोड़ा भिन्न हो। सोलहवीं लोकसभा के अंतिम दो वर्षों में राजनीति इतनी हावी हो गई थी कि अनेक महत्व के मसले बहस से वंचित रह गए।

सबसे पहले सत्रहवीं लोकसभा की अंतःरचना को समझते हैं। इस बार आधे से अधिक यानी 277 सांसद पहली बार संसद पहुंचे हैं। इसमें भाजपा अध्यक्ष व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हैं। इस बार लोकसभा में सांसदों की औसत उम्र 54 साल है। इनमें 25 से 40 वर्ष की उम्र के करीब 12 प्रतिशत सांसद हैं। 40 से 55 साल के करीब 41 प्रतिशत सांसद हैं। 56 से 70 साल के 42 प्रतिशत सांसद लोकसभा पहुंचे हैं। 70 साल से अधिक उम्र के केवल छह प्रतिशत सांसद ही हैं। इस बार लोकसभा में महिला सांसदों की कुल संख्या 78 है। इसलिए हो सकता है महिला आरक्षण का मामला इस बार सबसे ज्यादा गरमाए।

इस बार स्नातक तक पढ़े 394 लोग संसद पहुंचे हैं। 39 प्रतिशत सांसदों ने स्वयं को राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता बताया है। यानी प्रोफेशनल राजनीति के दौर में ये पूर्णकालिक राजनीतिक लोग हैं। हालांकि लंबे समय से लोकसभा का चेहरा बने कई बड़े नेता इस बार नहीं होंगे, जिनमें भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुमित्रा महाजन, सुषमा स्वराज, हुकुमदेव नारायण यादव, पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा आदि शामिल हैं। ये सारी स्थितियां लोकसभा की कार्यवाही पर असर डालेंगी।

सोलहवीं लोकसभा में 133 विधेयक पास हुए, जो पिछली लोकसभा से 15 प्रतिशत ज्यादा थे। 16वीं लोकसभा के कार्यकाल में राज्यसभा ने भी कई ऐतिहासिक काम किए। वर्षों से लटके वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को मूर्त रूप दिया जा सका। गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का कानून बना। करीब 1,400 अप्रासंगिक कानूनों को खत्म किया गया। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आर्थिक अपराधी भगोड़ा कानून, बेनामी कानून से लेकर भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन, आयकर कानून में बदलाव, रियल्टी सेक्टर के नियमन के लिए रेरा तथा नाबालिग बच्चियों एवं बच्चों के खिलाफ यौन अपराध में फांसी की सजा जैसे कानून इसी संसद की देन हैं।

कहने का तात्पर्य यह कि राजनीति के टकराव के माहौल में भी सोलहवीं लोकसभा एवं इस दौरान की राज्यसभा ने जैसे कानून बनाए, उससे यह उम्मीद कायम है कि सब कुछ नष्ट नहीं हुआ। इस पृष्ठभूमि में सत्रहवीं लोकसभा एवं इस काल की राज्यसभा के भविष्य को लेकर मिश्रित तस्वीर सामने आती है। पता नहीं, कांग्रेस अपनी पराजय के बाद क्या रणनीति अपनाएगी? कांग्रेस कह रही है कि हमारी लड़ाई विचारधारा की थी और है।

सवाल है कि वह यह लड़ाई संसद में कैसे लड़ेगी! लोकसभा में आंध्र से वाईएसआर कांग्रेस विपक्ष के साथ नहीं जाएगी। बीजद की नीति सरकार के विरुद्ध न आक्रामकता की थी, न होगी। पांच साल बाद संसद में पहुंचा द्रमुक सरकार के खिलाफ कितना आक्रामक होगा, कहना कठिन है। तृणमूल की संख्या घटी है, किंतु बंगाल की राजनीतिक लड़ाई के आलोक में वह सरकार को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

इसी तरह बसपा भी सरकार के विरुद्ध रहेगी। लेकिन सरकार के पास जितना बड़ा संख्या बल है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा सधी हुई रणनीति अपनाएगी। देश चाहेगा कि संसद बहस, प्रश्नोत्तर तथा विधेयक पारित करने के अपने मूल चरित्र की ओर लौटे तथा दलीय राजनीति का अड्डा न बने।
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