कुछ दिन पहले कोलकाता के एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स के प्रांगण में एक पेड़ के नीचे कुछ लोग दो पत्थर रखकर चले गए। उसके बाद न जाने कब उन पत्थरों पर लोगों ने फूल रख दिए, फिर उनकी पूजा शुरू हो गई। अब उन्हें हटाना मुश्किल था। फिर भी एक नास्तिक ने उन्हें हटाने की कोशिश की, तो कुछ लोगों ने भारी विरोध किया।
कोलकाता के कुछ उदारवादी लोगों का कहना था कि प्रगतिशील लोगों के सांस्कृतिक प्रांगण में, उदार चिंतकों के विचार-विमर्श की जगह पर मंदिर निर्माण की कोशिश हो रही है। मंदिर बन जाने पर आसपास संस्कृति चर्चा के बदले धर्म की चर्चा ही होगी। अति धार्मिक लोग धर्म को ही संस्कृति बनाना चाहते हैं, वे संस्कृति को धर्म का दर्जा देने के इच्छुक नहीं हैं। कुछ लोगों ने साहस का परिचय देते हुए यह भी कहा कि मंदिर बनाने के लिए फाइन आर्ट्स के परिसर को ही क्यों चुना जाना चाहिए? वह परिसर फाइन आर्ट्स के लिए तय है, मंदिर के लिए नहीं। किसी मंदिर के परिसर में कोई फाइन आर्ट एकेडमी स्थापित करने नहीं जाता, ऐसे में, एकेडमी परिसर में मंदिर का क्या औचित्य!
धार्मिक लोगों के साथ मुश्किल यह है कि वे पृथ्वी की पूरी जगह पर अधिकार जमा लेना चाहते हैं। वे सभी सरकारों को अपना प्रचारक, और सभी प्रतिष्ठानों को अपना समर्थक बना लेना चाहते हैं। वे खुद जिस पर विश्वास करते हैं, चाहते हैं कि दुनिया के तमाम लोग उसी पर विश्वास करें। बांग्लादेश के रोहिंग्या शिविरों में ढाई हजार मस्जिद और मदरसे बनाए गए हैं। रात में मुल्ले-मौलवी वहां तकरीर करते हैं, उन रोहिंग्याओं को सलाह देते हैं कि म्यांमार अगर उन्हें वापस बुलाए, तब भी उन्हें नहीं जाना चाहिए। शिविरों में खेलते रोहिंग्या बच्चों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है। हममें से बहुतों को पता है कि इन रोहिंग्या शरणार्थियों को जेहादी बनाने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हैं।
कोलकाता के एकेडमी परिसर में मंदिर बनाने की कोशिश सफल नहीं हुई। चूंकि मुस्लिमों की तरह बहुसंख्यक हिंदू कट्टर नहीं हैं, इसलिए इस मामले ने तूल नहीं पकड़ा। कहीं कोई दंगा नहीं भड़का। चूंकि मैं धर्म में विश्वास नहीं करती, इस्लाम धर्म की निर्मम आलोचक हूं, इसलिए फाइन आर्ट्स एकेडमी मुद्दे पर मैं भी उदारवादियों के साथ ही थी।
मेडिकल कॉलेज के परिसर में अस्पताल बन सकता है, नाट्य मंच के बगल में नाटक अकादमी का औचित्य समझ में आता है, मंदिर परिसर में गुरुकल की स्थापना स्वाभाविक है। वैसे ही जैसे, मस्जिद के बगल में मदरसे होते हैं। दरअसल जिस चीज का जहां औचित्य हो, उसे वहां ही होना चाहिए।
जिस कोलकाता की मैं बात कर रही हूं, वहीं हवाई अड्डे के दूसरे रनवे के सामने एक मस्जिद है। आठ नंबर गेट से रोज तीस-चालीस लोग मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते हैं। शुक्रवार को नमाज पढ़ने वालों की संख्या सौ से अधिक हो जाती है। उस गेट से मस्जिद तक के रास्ते को कांटेदार तार से घेर दिया गया है। लेकिन यह तो कोई समाधान नहीं है। मस्जिद के कारण हवाई अड्डे के सुरक्षित इलाके में बाहरी लोगों के घुस जाने की आशंका है।
उस मस्जिद को वहां से हटाकर दूसरी जगह ले जाने की कोशिश लंबे समय से चल रही है। लेकिन ऐसा करना संभव नहीं हो पाया है। भविष्य में ऐसा हो पाएगा, इस बारे में भी दावे के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता। रनवे के पास मस्जिद की जगह अगर कोई दुकान होती, तो उसे हटाने में समस्या नहीं आती। मस्जिद है, इसीलिए समस्या है। वहां से उस मस्जिद को हटाने के लिए कुछ राजनेताओं ने दारूल उलूम के कुछ अधिकारियों के साथ बातचीत भी की है। इस संबंध में मस्जिद कमेटी तथा राज्य और केंद्र सरकारों के बीच बैठक होने की भी बात थी। लेकिन अभी तक ठोस कुछ हो नहीं पाया है। यह सबको मालूम है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से रनवे के सामने से मस्जिद को हटा देने की जरूरत है।
हवाई अड्डे के अधिकारियों का कहना है कि मस्जिद को हटा देने से दूसरे रनवे को बड़ा किया जा सकता है, साथ ही, रनवे तक पहुंचने का जो रास्ता है, उसकी चौड़ाई भी बढ़ाई जा सकती है। अगले कुछ साल में कोलकाता हवाई अड्डे पर यात्रियों की संख्या बढ़ेगी, उड़ानों की संख्या में भी वृद्धि होगी। इसी कारण एक नया टर्मिनल भी बन रहा है। लेकिन रनवे अगर ऐसा ही रह जाता है, तो टर्मिनल बढ़ाने का भी कोई खास लाभ नहीं होगा। हवाई अड्डे के अधिकारी इन सारे तथ्यों से अवगत हैं। पर वे क्या कर सकते हैं?
किसी भी राजनेता ने मस्जिद को वहां से हटाने के मामले में सक्रियता दिखाने की कोशिश नहीं की है, क्योंकि वह जानते हैं कि ऐसा करने पर मुस्लिमों के वोट नहीं मिलेंगे। वोट के कारण भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण की जो राजनीति दशकों से चल रही है, वह अब भी बरकरार है। यह कहना गलत होगा कि ऐसे राजनेता मुस्लिम समुदाय की बेहतरी चाहते हैं। अगर वे मुस्लिमों की बेहतरी के आकांक्षी होते, तो मुसलमानों की मानवीय गरिमा का ख्याल रखते, उन्हें शिक्षित, सजग और आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करते, उन्हें प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी बनाने की कोशिश करते।
वोट खिसकने के भय से जब राजनेता इस संबंध में कोई सक्रियता नहीं दिखा रहे, तब मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़कर मस्जिद को वहां से हटा लेने के बारे में सक्रियता दिखानी चाहिए। अगर वे यह कदम उठाते हैं, तो मुसलमानों पर आम आदमी का भरोसा बढ़ेगा। वे मानेंगे कि मुसलमान सिर्फ अपने हित के बारे में नहीं सोचते, बल्कि सुरक्षा और देशहित के बारे में भी सोचते हैं। अगर मुस्लिमों के प्रति गैर मुस्लिमों की धारणा बदलती है, तो इससे मुसलमानों को ही लाभ होगा।