एक दिन राजा अपने विशाल राजसभागृह में बैठे थे। चारों ओर शांति थी और टिमटिमाते दीप प्रकाशित हो रहे थे। अचानक राजा के मन में एक प्रश्न उठा और वह अपने पुरोहित महर्षि वशिष्ठ के पास जाकर विनम्रता से बोले, ‘भगवन्! ऐसा कौन-सा धर्म है, जिसके प्रभाव से मुझे इतनी उत्तम लक्ष्मी प्राप्त हुई है? मेरे शरीर में जो निरंतर तेज भरा रहता है, इसके पीछे कौन-सा कारण छिपा है?’
वशिष्ठ जी मुस्कराए, मानो वर्षों पुरानी कोई स्मृति उनके मन में तैर उठी हो। वह बोले, ‘राजन ! यह सब तुम्हारे पिछले जन्म के पुण्य का प्रताप है। मैं तुम्हें वह कथा कहता हूं।’
फिर वशिष्ठ जी ने कहना शुरू किया, ‘प्राचीन काल में लीलावती नाम की एक वेश्या थी, पर मन से अत्यंत धर्मपरायण थी और भगवान शिव का भजन करती थी।
एक बार उसने पुष्कर में चतुर्दशी के दिन नमक का एक विशाल पर्वत बनाकर उस पर सोने की देव प्रतिमाएं स्थापित कीं और विधिपूर्वक दान किया। उस समय ‘शुद्ध’ नामक एक गरीब, पर सात्विक प्रवृत्ति का सुनार, लीलावती के घर नौकर का काम करता था। प्रतिमाएं बनाने का कार्य उसी को सौंपा गया था। उसने बड़ी श्रद्धा से देवी-देवताओं की सुवर्ण मूर्तियां गढ़ीं। वे सब इतनी अनुपम थीं कि देखते ही मन श्रद्धा से भर जाता था। सुनार ने इसे धर्म का कार्य समझकर मजदूरी लेने से भी मना कर दिया। शुद्ध की पत्नी भी लीलावती के घर में काम करती थी। नमक के पर्वत पर लगे स्वर्ण वृक्षों को चमकाने का कार्य सुनार की पत्नी ने ही किया था। पति-पत्नी ने पूरे तन-मन से उस अनुष्ठान को संपन्न कराया। कुछ समय बाद लीलावती अपने पुण्य से स्वर्ग चली गई। उस सुनार ने आपके, यानी राजा धर्ममूर्ति के, रूप में जन्म लिया है। आपका यह तेज, विजयशक्ति व अपराजेयता-सब उसी पुण्य का फल है।’
राजा धर्ममूर्ति यह सुनकर स्तब्ध रह गए। वशिष्ठ जी ने आगे कहा, ‘और उसी सुनार की पत्नी लीलावती आपकी पत्नी, यानी रानी भानुमती, के रूप में पैदा हुई हैं। इसीलिए उनका रूप भी त्रिभुवन में अनुपम है। राजन्! आप दोनों ने उस समय जो निर्मल भावना से कार्य किया था, उसी कारण आज आपको राजलक्ष्मी, आरोग्य, सौभाग्य और अपराजेयता प्राप्त हुई है। यदि आगे भी ऐसा ही फल चाहते हैं, तो धान्य व अन्य पदार्थों के पर्वत बनाकर उनका दान कीजिए, जैसे लीलावती ने नमक का पर्वत दान किया था।’
यह सुनकर धर्ममूर्ति ने कहा, ‘भगवन्! जैसा आपने कहा, मैं वैसा ही करूंगा।’ और फिर धर्ममूर्ति ने विशाल पर्वतों के समान अन्न भंडार, घी, शक्कर, धान्य, वस्त्र तथा विभिन्न सामग्रियों के ढेर बनवाए और वशिष्ठ जी के निर्देशन में उनका विधिपूर्वक दान किया। इसके बाद आकाश से देवताओं ने राजा पर पुष्प-वर्षा की। उस पुण्य से राजा धर्ममूर्ति देवताओं द्वारा पूजित हुए और अंत में परमधाम को प्राप्त हुए।
पद्म पुराण के अनुसार, जो मनुष्य इस प्रसंग को श्रद्धापूर्वक सुनता है, वह भी पापमुक्त होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। अन्न आदि पर्वतों के दान का केवल पाठ भी दुःस्वप्नों का विनाश कर देता है, और जो पुरुष स्वयं इन पर्वतों का दान करता है, उसके अच्छे फल का तो वर्णन करना भी कठिन है।